गड़चिरोली में अनूठी पहल, गोंडवाना विवि ने स्थापित किया देश का पहला वैद्य चिकित्सालय
Gadchiroli Tribal Clinic: गोंडवाना विश्वविद्यालय ने आदिवासी वैद्यों के सहयोग से देश का पहला ‘वैद्य चिकित्सालय’ शुरू किया है। इस पहल से पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान को संस्थागत पहचान मिलेगी।
- Written By: अनन्या तिवारी
भारत का पहला वैद्य चिकितसालय गड़चिरोली के गोंडवाना विश्वविद्यालय में (सोर्स-फोटो नवभारत)
First Tribal Clinic In India: कभी नक्सल प्रभावित जिले के रूप में पहचान रखने वाला गड़चिरोली अब विकास और नवाचार की नई मिसाल पेश कर रहा है। पारंपरिक आदिवासी चिकित्सा ज्ञान और आधुनिक व्यवस्था के समन्वय से गोंडवाना विश्वविद्यालय ने स्थानीय आदिवासी वैद्यों के सहयोग से ‘वैद्य चिकित्सालय’ की स्थापना की है।इसे देश में अपनी तरह का पहला अभिनव उपक्रम माना जा रहा है।
मुख्यमंत्री की प्रेरणा, विश्वविद्यालय की पहल
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की प्रेरणा तथा विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. प्रशांत बोकारे के नेतृत्व में शुरू किए गए इस प्रकल्प से सदियों से संरक्षित आदिवासी चिकित्सा ज्ञान को पहली बार संस्थागत मान्यता प्राप्त हुई है।
गड़चिरोली के वन क्षेत्रों में रहने वाले गोंड, माड़िया, पारधी सहित अनेक आदिवासी समुदाय पीढ़ियों से पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों पर निर्भर रहे हैं। औषधीय वनस्पतियों के व्यापक ज्ञान और उपचार के लंबे अनुभव के बावजूद इन वैद्यों को कभी आधिकारिक पहचान नहीं मिल पाई थी।
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लुप्त होती विरासत को बचाने का प्रयास
आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के विस्तार के साथ उनका पारंपरिक ज्ञान उपेक्षा का शिकार होता गया। वहीं, युवा पीढ़ी के शहरों की ओर पलायन से इस अमूल्य विरासत के लुप्त होने का खतरा भी बढ़ रहा था। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए विवि ने अपने साइंस एंड टेक्नोलॉजी रिसोर्स सेंटर के माध्यम से इस परियोजना की शुरुआत की।
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गांव-गांव में आयोजित किए गए वैद्य सम्मेलन
केंद्र के प्रमुख स्वप्नील गिराडे के मार्गदर्शन में गांव-गांव में वैद्य सम्मेलन आयोजित किए गए। पारंपरिक ज्ञान रखने वाले वैद्यों का चयन कर उनकी उपचार पद्धतियों का वनस्पति वैज्ञानिकों और प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञों की सहायता से वैज्ञानिक परीक्षण एवं प्रमाणीकरण किया गया।
इसके बाद गोंडवाना विश्वविद्यालय परिसर में ‘वैद्य चिकित्सालय’ की स्थापना की गई, जहां पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान को व्यवस्थित रूप से संरक्षित और प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस पहल से न केवल आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षण मिलेगा, बल्कि पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के वैज्ञानिक अध्ययन और जनकल्याण में भी नई संभावनाएं विकसित होंगी।
