Gadchiroli News: ग्रामसभाएं नहीं देना चाहती भूपति को एक मौका, समन्वयक के रुप में की गई नियुक्ति का विरोध तेज

Bhupati Appointment Controversy: गडचिरोली में पूर्व माओवादी नेता भूपति की गोंडवाना विश्वविद्यालय में ग्रामसभा, पेसा और वनाधिकार से जुड़े समन्वयक के रूप में नियुक्ति का विरोध हुआ है।
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भूपति की नियुक्ति (सोर्सः सोशल मीडिया)
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Gadchiroli Gram Sabha Protest: वाल्या का वाल्मिकी बनने चले पूर्व माओवादी नेता मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ 'भूपति' की गोंडवाना विश्वविद्यालय के 'एकल' कार्यक्रम के तहत ग्रामसभा, आदिवासी नागरिक, पेसा तथा वनाधिकार कानून से संबंधित समन्वयक के रूप में की गई नियुक्ति का जिला संयुक्त ग्रामसभा पारंपरिक गोटूल समिति ने कड़ा विरोध किया है।

ग्रामसभा पदाधिकारियों ने नियुक्ति तत्काल रद्द कर पेसा कानून एवं वनाधिकार के क्षेत्र में अनुभव रखने वाले व्यक्ति की नियुक्ति करने की मांग की है। मांग पूरी नहीं होने पर ग्रामसभाओं की ओर से तीव्र आंदोलन करने की चेतावनी दी गई है। इस संबंध में सोमवार को आयोजित संवाददाता सम्मेलन में जिला पदाधिकारियों ने अपना विरोध दर्ज कराते हुए आंदोलन की चेतावनी दी।

भुले नहीं लोग

इस अवसर पर जिला महाग्रामसभा के नितिन पदा, सुरेश पुंगाटी, शिताराम मड़ावी, शिवाजी नरोटे, बाजीराव उसेंडी, भारती इष्टाम, वृद्धा किरेंगे, वर्षा ग्रामसभा पदा, विद्या दुर्वे, साधना मड़ावी, प्रवीण वड्डे, चिन्हा महाका तथा आदिवासी विद्यार्थी संगठन के नेता नंदू नरोटे उपस्थित थे। जिला महाग्रामसभा के नितिन पदा ने आरोप लगाया कि, भूपति के नेतृत्व में सैकड़ों आदिवासी माओवादी हिंसक गतिविधियों में शामिल हुए थे और उनके खिलाफ अनेक गंभीर मामले दर्ज हैं। माओवादी आंदोलन के दौरान भूपति ने ग्रामसभाओं के कामकाज का विरोध किया तथा अनेक निर्दोष आदिवासियों की हत्या हुई।

ग्रामसभा किसी के पुनर्वास की प्रयोगशाला नहीं

ग्रामसभा पदाधिकारियों ने कहा कि, वनाधिकार दावों की प्रक्रिया में ग्रामसभा एक वैधानिक संस्था है। इसलिए किसी भी समन्वयक को ग्रामसभा की निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने अथवा ग्रामसभा की ओर से निर्णय लेने का अधिकार नहीं है। गडचिरोली के आदिवासी समाज ने लंबे समय तक माओवादी हिंसा का सामना किया है। ऐसे में पूर्व वरिष्ठ माओवादी नेतृत्व से जुड़े व्यक्ति को इसी प्रभावित समाज की ग्रामसभाओं और उनके वैधानिक अधिकारों से जोड़ते समय स्थानीय समाज के विश्वास, भावनाओं और सामाजिक स्वीकार्यता को ध्यान में रखना आवश्यक है।

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नियुक्ति रद्द नहीं हुई तो तीव्र आंदोलन

ग्रामसभा पदाधिकारियों ने कहा कि, गोंडवाना विश्वविद्यालय द्वारा भूपति की नियुक्ति से आदिवासी समाज की भावनाओं को ठेस पहुंची है। जिस व्यक्ति पर लंबे समय तक माओवादी हिसक गतिविधियों से जुड़े होने के आरोप रहे हैं, उसे आदिवासी समाज के विकास और ग्रामसभा से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यों की जिम्मेदारी देना उचित नहीं है। उन्होंने नियुक्ति प्रक्रिया की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराने, पूरी प्रक्रिया पारदर्शी बनाने तथा स्थानीय ग्रामसभाओं के वैधानिक अधिकारों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की मांग की। सरकार ने भूपति की नियुक्ति तत्काल रद्द नहीं की तो जिले की ग्रामसभाओं की ओर से तीव्र आंदोलन किया जाएगा, ऐसी चेतावनी जिला महाग्रामसभा के पदाधिकारियों नेदी।

यह केवल व्यक्ति का नहीं, ग्रामसभा के अधिकारों का प्रश्न

नितिन पदा ने कहा कि, गडचिरोली जिला संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्र में आता है। ऐसा अधिनियम, 1996 तथा वनाधिकार अधिनियम, 2006 के तहत ग्रामसभाओं को महत्वपूर्ण वैधानिक अधिकार प्राप्त है। ऐसे में ग्रामसभा से संबंधित समन्वयक की नियुक्ति करते समय स्थानीय ग्रामसभाओं को विश्वास में क्यों नहीं लिया गया, यह गंभीर सवाल है। उन्होंने कहा कि, गडचिरोली में ग्रामसभा, पेसा और वनाधिकार के क्षेत्र में लंबे समय से काम करने वाले कई अनुभवी लोग मौजूद हैं।

इसके बावजूद भूपति का चयन किन मापदंडों के आधार पर किया गया, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए। ग्रामसभा पदाधिकारियों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से सवाल किया कि, इस पद के लिए खुली भर्ती या विज्ञापन जारी किया गया था या नहीं? कितने उम्मीदवारों ने आवेदन किया? पात्रता के मापदंड क्या थे? चयन समिति में कौन-कौन शामिल थे? साक्षात्कार में किस आधार पर अंक दिए गए? पेसा एवं वनाधिकार कानून के ज्ञान की जांच की गई थी या नहीं? तथा भूपति के चयन के पीछे लिखित कारण क्या है? इन सभी सवालों के जवाब सार्वजनिक करने की मांग की गई।

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