

Dhule Garbage Management Scam: धुले शहर की सफाई व्यवस्था अब स्वच्छता से ज्यादा "कचरा घोटाले" के लिए चर्चा में है। इस पूरे विवाद के केंद्र में तत्कालीन आयुक्त अमिता दगड़े पाटिल का कार्यकाल है। आरोप है कि उनके समय में लिए गए एक विवादास्पद फैसले ने नगर निगम की तिजोरी पर रोजाना लाखों रुपये का अतिरिक्त बोझ डाल दिया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जहाँ पहले एक कंपनी 1950 रुपये प्रति टन की दर से कचरा उठा रही थी, वहीं उसका ठेका रद्द कर 'भाग्यदिप्स वेस्ट मैनेजमेंट' को यही काम 8050 रुपये प्रति टन की दर पर सौंप दिया गया।
धुले शहर से निकलने वाले कचरे और उस पर होने वाले खर्च का गणित पूरी तरह से संदिग्ध नजर आता है। धुले से प्रतिदिन लगभग 208 मीट्रिक टन कचरा निकलता है। पुराने ठेके के अनुसार इस पर प्रतिदिन करीब 1.86 लाख रुपये खर्च होते थे, लेकिन नए ठेके के बाद यह खर्च बढ़कर 4.95 लाख रुपये प्रतिदिन हो गया है। यानी हर दिन मनपा की तिजोरी से 3 लाख रुपये से ज्यादा की अतिरिक्त राशि ठेकेदार की जेब में जा रही है। साल भर का हिसाब लगाया जाए तो यह घाटा करोड़ों में पहुँचता है, जिसका सीधा असर शहर के अन्य विकास कार्यों पर पड़ रहा है।
भ्रष्टाचार केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीन पर भी कई अनैतिक हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। शिकायत के अनुसार, ठेकेदार द्वारा बिल की राशि बढ़ाने के लिए कचरे का वजन फर्जी तरीके से बढ़ाया जा रहा है। आरोप है कि ट्रैक्टरों में कचरे के साथ मिट्टी भरी जा रही है ताकि वजन अधिक आए और भारी-भरकम बिल पास कराए जा सकें। इसके अलावा, कागजों पर 100 घंटागाड़ियां और 35 ट्रैक्टर जैसी भारी मशीनरी दिखाई गई है, लेकिन हकीकत में आधी सुविधाएं भी धरातल पर उपलब्ध नहीं हैं। दिखावे के नाम पर जनता के पैसों की सरेआम बर्बादी की जा रही है।
इस मामले में '10% कमीशन' और ऊपर तक सांठगांठ के आरोपों ने राजनीतिक माहौल गरमा दिया है। उद्धव सेना ने इस "कचरा खेल" के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए प्रशासन से सख्त कदम उठाने की मांग की है। उनकी प्रमुख मांगों में इस विवादित ठेके को तत्काल रद्द करना, पूरे मामले का निष्पक्ष 'स्पेशल ऑडिट' कराना और दोषी अधिकारियों व ठेकेदार पर आपराधिक मामला दर्ज करना शामिल है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासन इन गंभीर आरोपों पर क्या कार्रवाई करता है या फिर करोड़ों का यह घोटाला फाइलों के नीचे दबकर रह जाएगा।