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देवेंद्र फडणवीस का बड़ा बयान: सभापति के निर्देश ‘ब्रह्मवाक्य’ नहीं, कार्यपालिका के अधिकारों में हस्तक्षेप संभव

  • Author By Sunyanan Pathak | published By रूपम सिंह |
Updated On: Mar 24, 2026 | 06:33 PM
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Devendra Fadnavis News: देवेंद्र फडणवीस ने मंगलवार को सदन में स्पष्ट किया कि सभापति या उपसभापति के निर्देश अंतिम अथवा “ब्रह्मवाक्य” नहीं माने जा सकते, विशेषकर जब मामला कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र से जुड़ा हो।

उन्होंने कहा कि संविधान के तहत मंत्रिमंडल, विधानसभा और विधान परिषद इन तीनों के अधिकार स्पष्ट रूप से निर्धारित हैं और सभी को अपने-अपने दायरे में कार्य करना होता है। सामान्यतः सभापति या अध्यक्ष के निर्देशों का सम्मान और पालन किया जाता है, लेकिन वे कार्यपालिका के निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते।

मुख्यमंत्री यह बयान नीलम गोरहे द्वारा सातारा के पुलिस अधीक्षक तुषार दोषी को निलंबित करने के निर्देश के संदर्भ में दे रहे थे। उन्होंने कहा कि सभापति अपने अधिकार से निर्देश दे सकते हैं, लेकिन उनका आदेश अंतिम नहीं होता।

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इस मुद्दे को सदन में अनिल परब ने उठाया। उन्होंने उपसभापति द्वारा एक आईपीएस अधिकारी के निलंबन के निर्देश पर सवाल खड़े करते हुए अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के अधिकारों को लेकर स्पष्टीकरण मांगा। परब ने यह भी पूछा कि यदि निलंबन का अधिकार नहीं है, तो ऐसा निर्देश कैसे दिया गया।

जवाब में मुख्यमंत्री ने कहा कि यदि कोई अधिकारी मंत्रियों की ब्रीफिंग में अनुपस्थित रहता है, तो उस संदर्भ में सदन में दिया गया निर्देश “सदन का निर्देश” माना जाता है। मंत्री यदि निलंबन की बात कहते हैं, तो उसे लागू करने का अधिकार कार्यपालिका के पास होता है।

उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि यदि तथ्यों में अंतर होता है, तो कार्यपालिका उस निर्णय में संशोधन कर सकती है। यदि किसी कारणवश निर्णय लागू नहीं हो सकता, तो इसकी जानकारी सदन को देना आवश्यक है। ऐसे मामलों में सभापति परिस्थितियों के अनुसार निर्देश दे सकते हैं, लेकिन उन्हें अंतिम या अपरिवर्तनीय नहीं माना जा सकता।

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Published On: Mar 24, 2026 | 04:45 PM

Topics:  

  • Akola News
  • Devendra Fadnavis
  • Maharashtra News

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