

छत्रपति संभाजीनगर में पत्नी पीड़ित पुरुष आश्रम का अनोखा प्रदर्शन।
विजयादशमी के मौके पर रावण की जगह शूर्पणखा के पुतले का दहन।
देश में पुरुषों के अधिकारों के लिए राष्ट्रीय पुरुष आयोग का गठन।
Chhatrapati Sambhajinaghar Shurpanakha Dahan: पूरे देश में विजयादशमी का त्योहार बड़ी धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। जगह-जगह रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले जलाकर असत्य पर सत्य की विजय का संदेश दिया जा रहा है। हालांकि, इस पारंपरिक उत्सव के बीच महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर से एक अनोखी तस्वीर सामने आई है। यहां अपनी पत्नियों से प्रताड़ित पुरुषों की ओर से अनोखा प्रदर्शन आयोजित किया गया।
छत्रपति संभाजीनगर शहर के वालुज इलाके में 'पत्नी पीड़ित पुरुष आश्रम' के बैनर तले जुटे दर्जनों पुरुषों ने दशहरे के अवसर पर पारंपरिक रावण दहन के बजाय प्रतीक के रूप में शूर्पणखा का दहन किया। इस अनोखे आंदोलन के जरिए संगठन ने केंद्र और राज्य सरकार का ध्यान पुरुषों की समस्याओं की ओर खींचने की कोशिश की है।
'पत्नी पीड़ित पुरुष आश्रम' के संस्थापक और अध्यक्ष भारत फुलारे ने इस विरोध प्रदर्शन के संबंध में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि उनकी संस्था पिछले 10 वर्षों से लगातार प्रताड़ित पुरुषों के अधिकारों, उनके कानूनी संरक्षण और मानसिक सहयोग के लिए काम कर रही है। फुलारे के अनुसार, संस्था पिछले एक दशक से हर विजयादशमी के दिन शूर्पणखा का दहन कर अपना विरोध दर्ज कराती आ रही है।
पत्नी पीड़ित पुरुष आश्रम संस्था के अध्यक्ष भारत फुलारे का कहना है कि जिस तरह से रावण दहन को समाज में बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक माना जाता है, ठीक उसी तरह महिलाओं के भीतर व्याप्त गलत प्रवृत्तियों और दुर्भावनाओं के विरोध में यह प्रतीकात्मक शूर्पनखा दहन किया जाता है।
छत्रपति संभाजीनगर में प्रदर्शन के दौरान भारत फुलारे और अन्य सदस्यों ने आरोप लगाया कि देश में महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकारों के लिए कई कठोर कानून बनाए गए हैं, लेकिन वर्तमान में इनमें से कई कानूनों का दुरुपयोग बढ़ गया है। झूठे मामलों और पारिवारिक विवादों के चलते निर्दोष पुरुषों और उनके बुजुर्ग माता-पिता या परिजनों को कानून के घेरे में घसीटकर मानसिक व आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है।
संगठन का तर्क है कि हर विवाद या कानूनी मामले में केवल महिला ही पीड़ित हो, ऐसा आवश्यक नहीं है। समाज में कई ऐसे पुरुष भी हैं जो गंभीर अन्याय और घरेलू हिंसा का सामना कर रहे हैं, लेकिन उनकी बात सुनने के लिए कोई समर्पित मंच उपलब्ध नहीं है।
आंदोलनकारियों ने कहा कि जिस प्रकार महिलाओं की शिकायतों, सुरक्षा और कानूनी सहायता के लिए राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर महिला आयोग कार्य करते हैं, उसी प्रकार पुरुषों की समस्याओं के समाधान और उन्हें निष्पक्ष न्याय दिलाने के लिए एक स्वतंत्र 'पुरुष आयोग' का गठन होना चाहिए। संगठन ने चेतावनी दी है कि जब तक सरकार पुरुष आयोग का गठन नहीं करती, तब तक उनका यह प्रतीकात्मक और शांतिपूर्ण आंदोलन हर साल इसी तरह जारी रहेगा।