

Mohan Bhagwat RSS Vijayadashami Speech: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के समापन और विजयादशमी उत्सव के अवसर पर नागपुर में आयोजित कार्यक्रम में सरसंघचालक मोहन भागवत ने संबोधित किया। अपने संबोधन में उन्होंने संघ के 100 वर्षों के सफर, भारत की सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक समरसता, और वर्तमान वैश्विक चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने देशवासियों से एकजुट होकर राष्ट्र निर्माण में योगदान देने की अपील की। आइए जानते हैं मोहन भागवत की भाषण की 10 बड़ी बातें
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने देश की शताब्दी यात्रा के तहत 'स्व' के बोध और स्वदेशी के आचरण को अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हमने अपने देश के संविधान में अपने आप को एक प्रजा के रूप मे, विविधता के बावजूद भावनात्मक दृष्टि से एकरस समाज के रूप में, ‘हम भारत के लोग’ ऐसा, संबोधित किया है। उस भावनात्मक बंधन को उत्तरोत्तर दृढ़ बनाते जाने का दिग्दर्शन भी स्पष्ट शब्दों में उसी संविधान के मार्गदर्शक तत्त्वों में है।
संत शिरोमणि रविदास जी की 650वीं जयंती, स्वामी श्रद्धानंद के बलिदान के 100 वर्ष और स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के कार्यों को याद करते हुए उनके जीवन से प्रेरणा लेने का आह्वान किया गया। उन्होंने कहा कि जिस स्व की रक्षा के लिए इन महापुरुषों के बलिदान हुए, उसी आत्मबोध को समाज में स्वदेशी मेलों के द्वारा जागृत करने का प्रयास करने वाले ‘हिंदू मेला’ के प्रेरक व प्रवर्तक, बंग भूमि के स्वर्गीय राज नारायण बसु के भी जन्म का 200वां वर्ष चल रहा है।
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने नेपाल त्रासदी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि नेपाल में जिस भयंकर त्रासदी को झेलना पड़ा, हजारों मनुष्यों की बलि चढ़ गई, उसके मूल में कहीं ना कहीं सम्पूर्ण हिमालय क्षेत्र में जो भारत, तिब्बत, भूटान, चीन में चले एकांगी विकास का परिणाम है। ऐसे में विकास की समग्र व संतुलित दृष्टि निर्माण होना आवश्यक है।
भारत की विविधता को स्वीकार करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि सनातन संस्कृति ही देश की एकता का मुख्य आधार है, जो सभी पंथों और जातियों को सम्मान देती है। समाज में सकारात्मक बदलाव के लिए पांच प्रमुख बातों समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण, स्व-बोध और नागरिक अनुशासन को अपने जीवन में उतारने की अपील की गई।
अपने संबोधन के दौरान मोहन भागवत ने आधुनिक तकनीक और सोशल मीडिया के दुष्परिणामों पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को उचित-अनुचित का विवेक सिखाना जरूरी है और OTT प्लेटफॉर्म्स पर उचित नियंत्रण की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान काल में परिवार के बड़ों से, विद्यालयों के पाठ्यक्रम से अथवा समाज के वातावरण से यह संस्कार मिलना दिन-प्रतिदिन कम हो रहा है।
अनेक देशों में नई पीढ़ी को उन माध्यमों से मिलती हुई जानकारी बिना उचित-अनुचित का विवेक किये नई पीढ़ी ग्रहण करती है। उसके दुष्परिणामों का अनुभव ले चुकने के बाद उन देशों ने उन माध्यमों पर कुछ अनुशासन और निर्बंध लागू किये है। हमारे अपने देश में भी इस प्रकार की आवश्यकता, विशेषत: ‘OTT platforms’ को लेकर, समाज में अनुभव की जा रही है।
मोहन भागवत ने कहा कि नई पीढ़ी को उचित-अनुचित का विवेक करना सिखाना पड़ेगा। विवेक के अभाव में ही विश्वभर में नई पीढ़ी नशीली दवाओं की आदत की शिकार हो रही है। नशा एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या है और उसके परिहार के लिए समय रहते शासन-प्रशासन तथा समाज को प्रयास प्रारम्भ करने चाहिए। समाज की वर्तमान अभिभावक पीढ़ी को यह विवेक नई पीढ़ी को देना पड़ेगा व नई पीढ़ी को अपनेआप को ऐसी आदत निर्माण करने वाले सभी प्रवृत्तियों से दूर रखना पडेगा। इस दृष्टी से भारत में इस समस्या का निराकरण करने वाले सभी को साथ लेकर देशभर में इस समस्या का निरास करने वाला एक देशव्यापी प्रतिरोध खड़ा हो इसलिए स्वयंसेवक प्रयास करेंगे।
राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि 'हिन्दू भाव' किसी पूजा पद्धति या भाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिकता, मानवता और विश्वबंधुत्व का प्रतीक है जो पूरी दुनिया को जोड़ सकता है। हमारे राष्ट्र की चेतना यही सनातन दृष्टि है, जिसे आज हम भारत के लोगों सहित सारा विश्व हिन्दू दृष्टि के नाम से जानता है। कोई विशिष्ट पूजा पद्धति, कोई विशिष्ट खान-पान, रहन-सहन, कोई सामाजिक या राजनीतिक मतवाद किसी विशिष्ट जाति, भाषा, प्रान्त इस की अनिवार्यता इसमें नहीं है।
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में देश को कमजोर करने या आंतरिक कलह पैदा करने वाली ताकतों और षडयंत्रों के प्रति सजग रहने की चेतावनी दी।
उन्होंने कहा कि भारत सहित सारे विश्व में जो-जो भद्रता, मांगल्य, सांस्कृतिक व मानवीय संस्कार है, वह सारा नष्ट-भ्रष्ट उद्धवस्त करने की आसुरी प्रतिज्ञा लेकर पश्चिम से एक आंधी चली है। विश्वभर के तथाकथित प्रगत देश भी उस से त्रस्त, असहाय हैं। भारत की प्रगति के कारण विश्व के राष्ट्रों में अराजकता खड़ी कर अपने स्वार्थों की पूर्ती के लिए सहाय्यक हो सकने वाले अपने पिट्ठुओं को वहां स्थापित करने का षडयंत्र करने वाली ताकतों के खेल बंद होंगे। इस वस्तुस्थिति को ये आसुरी ताकतें जानती है। इसलिए भारत ही उस का निर्णायक व सब से बलवान प्रतिस्पर्धी और अंतिम एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य है।
भारत, हिंदू व संघ को किस प्रकार तोड़ सकते हैं इस का विचार कर योजना बना कर वे कार्य करती हैं। उन्हीं की प्रकृति के कुछ लोग इसमें उन्हें सहायता के लिये मिल जाते हैं। क्षुद्र सत्तास्वार्थ तथा विवेकहीनता के कारण कुछ महत्वाकांक्षी नेता लोग भी शामिल होते है।
RSS प्रमुख ने कहा कि अपने इतने बड़े समाज में समस्याएं तो है। व्यवस्था की कमियां भी ढेर सारी होगी। उनके चलते आंदोलनों का होना भी स्वाभाविक ही है। परन्तु आंदोलन समाधान देने के लिए होने चाहिए।
आंदोलन करने वालाें, शासन-प्रशासन और राजनीतिक नेताओं यह बात ध्यान रखना चाहिए कि हमारी करनी के कारण किसी प्रकार की अनबन, द्वेष, त्वेष, मलाल या विभाजन पैदा नहीं होना चाहिए, भावनाएं तीव्र होने पर भी हमारे संविधान कानून की मर्यादा में, बोल चाल चलन के भद्र व्यवहार के संकेतों की मर्यादा में हमारी कृतियां हों, यह ध्यान रखना चाहिए। वोट, सस्ती लोकप्रियता अथवा राजनीतिक लाभ का लोभ हमारे विवेक व सद्भावना पर हावी न हो यह चिंता करनी ही पड़ेगी।
अंत में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने देश के प्रत्येक नागरिक से अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भारत को पुन: विश्वगुरु और परम वैभव संपन्न राष्ट्र बनाने के संकल्प के साथ आगे बढ़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारत का परमवैभव तथा विश्वगुरुत्व हममे से प्रत्येक के पुरुषार्थ से सिद्ध होने वाला है। दूसरा कोई भी पर्याय अथवा छोटा रास्ता उपलब्ध नहीं है।
अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक तथा व्यावसायिक जीवनव्यवहार में नित्य छोटी-छोटी सत्कृतियों के द्वारा परिवर्तन लाते हुए सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी अपने कर्तव्य का पालन कर सकता है।