भाजपा के साथ जाने की क्या थी मजबूरी? चंद्रपुर में नहीं थम रहा सत्ता संग्राम, UBT आलाकमान आज करेगा बड़ा फैसला!

BJP Chandrapur Internal Conflict: चंद्रपुर मनपा में सत्ता का 'खिचड़ी' गठबंधन। यूबीटी पदाधिकारी पहुंचे मातोश्री। भाजपा में गुटबाजी तेज, कांग्रेस में नेता प्रतिपक्ष की तलाश।
Shiv Sena UBT leaders head to Matoshree over the controversial BJP alliance in Chandrapur MC.
चंद्रपुर महानगरपालिका (सौजन्य-नवभारत)
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Chandrapur Municipal Corporation News: चंद्रपुर शहर मनपा में भाजपा के साथ मिलकर सत्ता का साथी बनने के पीछे क्या विवशता थी? इस बारे में सोमवार को मुंबई के मातोश्री पर चर्चा हो रही है। चंद्रपुर के यूबीटी पदाधिकारी मातोश्री में आलाकमान के साथ वरिष्ठों से चर्चा कर चंद्रपुर मनपा में हुए सत्ता नाटक के रहस्यों से पर्दा उठाएंगे।

इस बीच आनेवाले समय में जब पालिका में विविध विषय समितियों के चुनाव होंगे तब शिवसेना यूबीटी को सम्मानजनक समितियों की चाह है। इसे लेकर भी चर्चा होने के आसार है। यूबीटी की नीति के खिलाफ हुई सत्ता की भागीदारी को कायम रखना या सशर्त साथ रहना? इसपर वरिष्ठों के आदेश लेकर चंद्रपुर के यूबीटी पदाधिकारी कल लौटेंगे।

वंचित की भूमिका पर भी उठे सवाल

चंद्रपुर शहर मनपा में चुनावी नतीजों की घोषणा के बाद से सत्ता का अनियंत्रित खेला चालू है। वंचित ने कांग्रेस के साथ जाने की अपनी नीति को दरकिनार किया है। यूबीटी के साथ होने के कारण वंचित के दो पार्षद रहस्यमयी रुप से महापौर उपमहापौर चुनाव के बीच नदारद रहे। यह चुनाव के ठीक बीस मिनट पहले अचानक हुआ, ऐसा दावा किया जा रहा है। यूबीटी ने पूराना राग अलापते हुए स्पष्ट किया कि कांग्रेस के नकारने के बाद उन्होने भाजपा का फूल खिलाने का फैसला लिया। कांग्रेस में भी सत्ता स्थापना के महानाटक को लेकर आत्मचिंतन शुरु हो गया है। यह आत्मचिंतन सीधे पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सपकाल के इस्तीफे की मांग तक चला गया है। इस बीच विधायक विजय वडेट्टीवार और सांसद प्रतिभा धानोरकर ने अपने अपने बयान देकर इस प्रकरण से पूरी तरह से किनारा कर लिया है।

भाजपा में भी असमंजस

उधर भाजपा में कोई अमन चैन नहीं है। महापौर पदग्रहण से 16 पार्षदों के वॉक आऊट के बाद से अंदरुनी कोयले धधक रहे है। चर्चा है कि विधायक जोरगेवार को अब कोई निमंत्रण न दिया जाए, ऐसा अभियान सोशल मीडिया पर चालू हो गया है। हालांकि किशोर जोरगेवार ने स्पष्ट किया था कि वॉक आऊट से नाराजगी केवल उस पदग्रहण तक सीमित थी। भाजपा का यह अंतर्विरोध आनेवाले समय में हो रही विषय समितियों के गठन के दौरान थम जाए तो बात आगे बढेगी, ऐसा राजनीतिक जानकारों का मानना है।

तीन दिनों बाद का मुहूर्त

पालिका में विविध समितियों के सभापति, नेता प्रतिपक्ष, जोन सभापति और नये परिवहन सभापति पद के लिए आगामी तीन दिनों में मुहूर्त निकल सकता है। विरोधी दल बनने के बाद भी कांग्रेस व मित्र पार्टियों को मिला कर 32 सदस्य है। सदन में विरोधी दल नेता का चयन भी एक अहम घटना है।

इसके लिए कांग्रेस को एक नाम तय करना होगा। उधर महत्वपूर्ण माने जानेवाले स्थायी समिति सभापति, बांधकाम, स्वास्थ्य, महिला व बाल कल्याण, जलापूर्ति, परिवहन और तीन जोन के सभापतियों के बंटवारे में भाजपा के पसीने छूटनेवाले है।

कांग्रेस दल का नेता कौन?

सत्ता के विरोध में बैठी कांग्रेस को अब अपने नेता का चुनाव बडी सूझबूझ के साथ करना होगा। बीते सत्ताकाल में कांग्रेस विपक्षी भूमिका में नजर ही नही आयी थी, ऐसा राजनीतिक जानकार बताते है। इस बार कांग्रेस के साथ जो खेला हुआ है, उससे सबक लेकर कोई दमदार नाम सामने आने की उम्मीद है। कांग्रेस के पास अनुभवी वसंत देशमुख और राजेश अड्डुर ऐसे दो सदस्य है।

बंटवारा इतना आसान नहीं

भाजपा को मित्र दलों को साथ लेकर विविध समितियों के सभापति चुनना उतना आसान नही है। महापौर पद के लिए अडी शिवसेना यूबीटी को स्थायी समिति के साथ अन्य में भी भागीदारी देना होगा। यह करते समय सुधीर मुनगंटीवार गुट व जोरगेवार गुट के सदस्यों को उचित सम्मान बराबरी से मिलना भी जरुरी हो गया है।

कांग्रेस के दो बागियों ने इस सत्ता स्थापना में अहम भूमिका निभाई उनमें से एक को उपमहापौर पद मिला है। दूसरे को उचित समिति देना भी भाजपा की विवशता है। वंचित ने परोक्ष भाजपा का साथ ही दिया है। ऐसे में उनकी भी उचित व्यवस्था करने की चुनौती होगी।

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