घर में रखा था पिता का शव, बोर्ड परीक्षा देने केंद्र पहुंची जांबाज बेटी, साहस देख रो पड़ा पूरा गांव

Janhavi Rahangdale Bhandara: भंडारा की जान्हवी राहांगडाले ने पिता की मृत्यु के अगले ही दिन 12वीं की बोर्ड परीक्षा दी। परीक्षा के बाद ही पिता का अंतिम संस्कार किया गया।
Janhavi Rahangdale Bhandara
Janhavi Rahangdale Bhandara (फोटो क्रेडिट-इंस्टाग्राम)
Updated on

Daughter HSC Exam Father Death: महाराष्ट्र के भंडारा जिला से एक ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आई है, जिसने साहस और कर्तव्यनिष्ठा की नई मिसाल पेश की है। एक तरफ घर के आंगन में पिता का पार्थिव शरीर अंतिम विदाई के इंतजार में रखा था, तो दूसरी तरफ बेटी की भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा थी। आंबागड गांव की जान्हवी राहांगडाले ने अपने व्यक्तिगत दुख को किनारे रखकर अपने पिता के अंतिम सपने को पूरा करने का फैसला किया और भारी मन से 12वीं की बोर्ड परीक्षा देने परीक्षा केंद्र पहुँची।

10 फरवरी 2026 को हुई इस घटना ने पूरे महाराष्ट्र को भावुक कर दिया है।

दुख का पहाड़ और कर्तव्य की पुकार

जान्हवी के पिता, हौशीलाल राहांगडाले, की सोमवार दोपहर एक सड़क दुर्घटना में दुखद मृत्यु हो गई थी। परिवार के मुखिया के अचानक चले जाने से पूरे गांव में मातम छा गया। घर में कोहराम मचा था और रिश्तेदार अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहे थे। लेकिन मंगलवार को जान्हवी का 12वीं (HSC) बोर्ड का अंग्रेजी का पहला पेपर था। जान्हवी के सामने एक तरफ पिता को अंतिम विदाई देने की भावना थी, तो दूसरी तरफ पिता का वह सपना जिसमें वे अपनी बेटी को पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनते देखना चाहते थे।

पिता का सपना: "पढ़ो और बड़ी बनो"

अपनी आंखों के आंसुओं को पोंछते हुए जान्हवी ने वह कठिन फैसला लिया जो किसी भी बच्चे के लिए असंभव सा होता है। उसे अपने पिता के शब्द याद आए, "पढ़ो और बड़ी बनो।" इसी संकल्प के साथ, वह अपने मामा के बेटे के साथ करीब 8 किलोमीटर का सफर तय कर आंबागड से तुमसर स्थित परीक्षा केंद्र पहुँची। परीक्षा हॉल में बैठे हुए जान्हवी के लिए हर शब्द लिखना एक परीक्षा थी, क्योंकि उसके दिमाग में पिता का चेहरा और घर पर रखा उनका पार्थिव शरीर घूम रहा था।

परीक्षा के बाद अंतिम विदाई

बोर्ड परीक्षा समाप्त होते ही जान्हवी बिना समय गंवाए तुरंत घर लौटी। उसके लौटने के बाद ही पिता हौशीलाल राहांगडाले का अंतिम संस्कार किया गया। जान्हवी ने न केवल परीक्षा दी, बल्कि अपने पिता की उस अंतिम इच्छा का सम्मान किया जो उन्होंने अपनी बेटी के भविष्य के लिए देखी थी। जान्हवी के इस अदम्य साहस, धैर्य और 'पहाड़ जैसे कलेजे' को देखकर तुमसर के परीक्षा केंद्र पर मौजूद शिक्षकों और गांव के हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं।

Navbharat Live
navbharatlive.com