विश्व पितृ दिवस विशेष: 123 लावारिस बच्चों के पिता बने पद्मश्री शंकरबाबा पापलकर

Padma Shri Shankarbaba Papalkar: विश्व पितृ दिवस पर जानिए पद्मश्री डॉ. शंकरबाबा पापलकर की प्रेरणादायक कहानी, जिन्होंने 123 लावारिस, दिव्यांग, दृष्टिहीन व अनाथ बच्चों को अपना नाम, पहचान और परिवार दिया।
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Dr Shankarbaba Papalkar (सोर्सः फाइल फोटो-सोशल मीडिया)
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Amravati News: आज वैश्विक पितृदिवस के अवसर पर पिता शब्द की सही परिभाषा को अपने कर्मों से सच साबित करने वाले पद्मश्री डॉ. शंकरबाबा पापलकर के कार्यों का गौरवपूर्ण उल्लेख करना बेहद प्रासंगिक है। खून का रिश्ता न होते हुए भी उन्होंने कुल 123 लावारिस, दृष्टिहीन, दिव्यांग, मूकबधिर और मानसिक रूप से विक्षिप्त बच्चों का पितृत्व स्वीकार कर मानवता का एक ऐसा अनूठा उदाहरण पेश किया है, जिसकी सराहना आज पूरे देश में हो रही है।

संत गाडगेबाबा के विचार ईश्वर को इंसानों में खोजो को अपना जीवनमंत्र मानते हुए शंकरबाबा ने जिले के अचलपुर तहसील के वज्झर में मानवता की एक अनोखी प्रयोगशाला खड़ी की है।

वज्झर का मानवता मॉडल

आज देश भर में वज्झर मॉडल के नाम से मशहूर इस पहल ने सैकड़ों बेसहारा बच्चों को नया जीवन दिया है। सबसे खास बात यह है कि इन सभी 123 बच्चों के सरकारी दस्तावेजों और पहचान पत्रों पर पिता के नाम की जगह आधिकारिक रूप से शंकरबाबा पापलकर ही दर्ज है। पितृत्व का इससे बड़ा सम्मान भला और क्या हो सकता है।

30 वर्षों की अनथक सेवा

लगभग 30 वर्ष पहले श्री हनुमान व्यायाम प्रसारक मंडल के प्रधान सचिव पद्मश्री प्रभाकरराव वैद्य के सहयोग से अंबादासपंत वैद्य मतिमंद, मूकबधिर व बेवारस बालगृह की स्थापना की गई थी। सड़कों पर, कचरे के ढेर में, रेलवे स्टेशनों पर लावारिस हालत में मिले मासूम बच्चों को पूरी कानूनी प्रक्रिया के तहत शंकरबाबा ने अपने परिवार में शामिल किया। उन्होंने इन बच्चों को न केवल आश्रय दिया, बल्कि ममता, शिक्षा, चिकित्सा और आत्मनिर्भर बनने की ताकत भी दी।

सरकारी नौकरी से लेकर गृहस्थी तकशंकरबाबा की देखरेख में पलेबढ़े इन बच्चों की सफलता आज समाज के लिए मिसाल है। यहां की रहने वाली माला पापलकर ने एमपीएससी की परीक्षा में शानदार सफलता हासिल की। संस्थान के 12 बच्चे आज विभिन्न सरकारी विभागों में जिम्मेदार पदों पर कार्यरत हैं।

123 बच्चों का परिवार

बाबा का पितृत्व केवल बचपन तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने वयस्क हो चुके 24 लड़केलड़कियों का धूमधाम से विवाह कराकर उन्हें वैवाहिक जीवन में स्थिर किया। इन विवाह समारोहों में कई मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों ने शामिल होकर उनके कार्यों की सराहना की। शंकरबाबा को मिला पद्मश्री पुरस्कारउनके इस अद्वितीय सामाजिक योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से और संत गाडगेबाबा अमरावती विश्वविद्यालय ने मानद डी.लिट. की उपाधि से सम्मानित किया है। आज 85 वर्ष की आयु में भी उनकी सेवा की लौ उतनी ही तेजी से जल रही है।

आजीवन रहने की अनुमति दें

पद्मश्री डॉ. शंकरबाबा पापलकर ने कहा कि 18 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद अनाथ बच्चों को बालगृह छोड़ना पड़ता है। लेकिन जो बच्चे मानसिक रूप से विक्षिप्त या पूरी तरह दिव्यांग हैं, वे भला कहां जाएंगे इसलिए भारत सरकार को कानून में संशोधन करना चाहिए और ऐसे दिव्यांग बच्चों को बालगृह में आजीवन रहने की अनुमति दी जानी चाहिए।

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