पांडव कचहरी या गोंड राजा का दरबार? महाराष्ट्र-MP सीमा पर उपेक्षित पड़ी है यह प्राचीन धरोहर
Historical Places : अमरावती से महज 8 किमी दूर सातपुड़ा की पहाड़ियों में एक प्राचीन रहस्य छिपा है। ईसा पूर्व 13-14वीं शताब्दी की 'पांडव कचहरी' आज प्रशासनिक अनदेखी के कारण खंडहर बन रही है।
- Written By: अंकिता पटेल
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Amravati Historical Places To Visit: महाराष्ट्र के अमरावती शहर से मात्र 8 किलोमीटर की दूरी पर, सातपुड़ा पर्वत श्रृंखला की शांत वादियों में एक ऐसी संरचना खड़ी है जो सदियों का इतिहास अपने भीतर समेटे हुए है।
ईसा पूर्व 13वीं-14वीं शताब्दी की मानी जाने वाली इस रहस्यमय धरोहर को स्थानीय लोग “पांडव कचहरी” के नाम से पुकारते हैं, जबकि इस क्षेत्र का आदिवासी समुदाय इसे “गोंड राजा की कचहरी” मानकर पूजता है। इतिहास, आस्था और रहस्यों का यह अनोखा संगम आज प्रशासनिक उपेक्षा की मार झेल रहा है और धीरे-धीरे जर्जर अवस्था की ओर बढ़ रहा है।
आस्था और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक
यह क्षेत्र न केवल ऐतिहासिक रूप से समृद्ध है, बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी बहुत महत्वपूर्ण है। मोर्शी के समीप स्थित सालबर्डी महादेव की गुफा में स्थापित भव्य शिवलिंग के दर्शन के लिए हर वर्ष महाशिवरात्रि पर लाखों श्रद्धालु यहाँ पहुँचते हैं।
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हाल ही में निर्मित सोन मोफत पचमू मार्ग के कारण यह क्षेत्र अब मध्यप्रदेश के आठनेर से सीधे जुड़ गया है। इसी मार्ग के किनारे “घोड़पाक” नामक प्राचीन स्थल स्थित है, जहाँ वर्तमान में महानुभाव पंथ का मंदिर बना हुआ है। इसी क्षेत्र के पास छिपी हुई है वह प्राचीन संरचना जिसे पांडव कचहरी कहा जाता है।
खंडहर बनते जा रहे नक्काशी और जर्जर स्तंभ
वर्तमान में पांडव कचहरी की स्थिति अत्यंत दयनीय और खंडहरनुमा हो चुकी है। मंदिर की दीवारों पर उकेरे गए शिल्प और मूर्तियां अब स्पष्ट नहीं रह गई हैं, हालांकि प्राचीन काल के भव्य स्तंभ आज भी अपनी मजबूती की गवाही देते हैं।
मंदिर के मुख्य द्वार के ललाट पर गणेश प्रतिमा की आकृति और त्रिशाखा द्वार पर उकेरी गई मूर्तियां अब खंडित अवस्था में हैं। मंदिर के भीतर एक शिवलिंग स्थापित है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह संरचना भगवान शिव को समर्पित रही होगी। परिसर के चारों ओर किलेबंदी के अवशेष भी दिखाई देते हैं, जो इसके सामरिक और प्रशासनिक महत्व को दर्शाते हैं।
प्रशासनिक अनदेखी से खोती जा रही पहचान
पूर्व में पुरातत्व विभाग द्वारा यहाँ एक लोहे का सूचना फलक लगाया गया था, जिसमें इसे मध्यप्रदेश पुरातत्व विभाग के संरक्षण में बताया गया था। लेकिन विडंबना यह है कि आज वह फलक भी हटाकर एक तरफ रख दिया गया है, जिससे यहाँ आने वाले पर्यटकों को इस स्थल के महत्व की जानकारी नहीं मिल पाती। महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित होने के कारण यह धरोहर दोनों राज्यों के बीच ‘अपेक्षित ध्यान’ की बाट जोह रही है।
धरोहर के संरक्षण की तत्काल आवश्यकता
पांडव कचहरी महज एक खंडहर नहीं, बल्कि गोंडवाना साम्राज्य और प्राचीन भारतीय वास्तुकला का जीवंत प्रमाण है। यहाँ एक बड़ा सभा कक्ष, स्वतंत्र छोटे कक्ष और एक दालन की संरचना इसके ‘कचहरी’ होने के दावे को पुख्ता करती है।
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नागरिक और इतिहासकार मांग कर रहे हैं कि दोनों राज्यों की सरकारों को मिलकर इस स्थल का जीर्णोद्धार करना चाहिए। यदि समय रहते इस प्राचीन धरोहर की सुरक्षा नहीं की गई, तो सातपुड़ा का यह ऐतिहासिक रहस्य हमेशा के लिए मिट्टी में मिल जाएगा।
