बिना बताए गायब हुए, फिर भी नौकरी पक्की? अमरावती मनपा की ‘मेहरबानी’ पर सरकार का जोरदार ब्रेक
Amravati MC News: नगर विकास विभाग ने अमरावती मनपा स्थायी समिति के एक पुराने प्रस्ताव को निलंबित कर दिया है, जिसमें बिना सूचना गायब रहने के कारण बर्खास्त किए गए प्यून देवीदास सारसर को बहाल किया गया था।
- Written By: केतकी मोडक
अमरावती महानगरपालिका (सोर्स- सोसल मीडिया)
Amravati Municipal Corporation Resolution Suspended: सरकार के नगर विकास विभाग ने अमरावती महानगरपालिका की स्थायी समिति द्वारा 16 फरवरी 2018 को पारित किए गए एक प्रस्ताव को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया है। यह कार्रवाई महाराष्ट्र महानगरपालिका अधिनियम की धारा 451 के तहत हुई। मामला महानगरपालिका के एक कर्मचारी को बर्खास्तगी के बाद नियमों को ताक पर रखकर दोबारा बहाल करने से जुड़ा हुआ है। शासनादेश के अनुसार देवीदास प्रहलाद सारसर अमरावती मनपा में प्रभारी बीट प्यून के पद पर कार्यरत थे।
वे 3 अगस्त 2016 से बिना किसी पूर्व सूचना या अनुमति के काम से गायब रहने लगे। मनपा प्रशासन द्वारा उन्हें अगस्त और सितंबर 2016 में कुल चार बार ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किया गया, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। नतीजतन, 7 अक्टूबर 2016 को उन्हें सेवा से निलंबित किया गया। उनके खिलाफ अनुशासनात्मक जांच शुरू की गई। जांच में आरोप सिद्ध होने के बाद मनपा सेवा नियमों के तहत 24 अगस्त 2017 को उन्हें सेवा से पूरी तरह बर्खास्त किया गया।
सरकार का निर्णय और 30 दिन का समय
नगर विकास विभाग की सह-सचिव द्वारा डिजिटल हस्ताक्षर से जारी आदेश में कहा गया है कि स्थायी समिति का वह प्रस्ताव धारा 451(1) के तहत अस्थायी रूप से निलंबित माना जाएगा। अधिनियम की धारा 451(2) के तहत सरकार ने अब संबंधित कर्मचारी देवीदास सारसर और अमरावती मनपा आयुक्त को इस आदेश की प्रति मिलने के 30 दिनों के भीतर अपना पक्ष रखने का अंतिम अवसर दिया है। यदि तय समय में कोई जवाब नहीं मिलता है, तो अधिनियम की धारा 451(3) के तहत अगली अंतिम कार्रवाई की जाएगी।
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स्थायी समिति का विवादित फैसला और महानगरपालिका आयुक्त ने जताई आपत्ति
बर्खास्तगी के इस आदेश के खिलाफ देवीदास सारसर ने अमरावती महानगरपालिका की स्थायी समिति के सभापति के पास अपील दायर की। 16 फरवरी 2018 को स्थायी समिति ने मनपा प्रशासन के फैसले को पलटते हुए सारसर की बर्खास्तगी रद्द कर दी और उन्हें दोबारा सेवा में लेने का प्रस्ताव पारित किया। चूंकि यह प्रस्ताव प्रशासनिक अनुशासन और मनपा के आर्थिक हितों के खिलाफ था, इसलिए तत्कालीन मनपा आयुक्त ने सरकार से इस प्रस्ताव को रद्द करने की सिफारिश की थी।
