तीन दशक बाद भी लक्ष्मी को अधिकार का इंतज़ार, महाराष्ट्र में लक्ष्मी मुक्ति योजना की सुस्त रफ्तार
Amravati News: महाराष्ट्र की लक्ष्मी मुक्ति योजना को 30 साल बाद भी अपेक्षित सफलता नहीं मिली। जानें क्यों सातबारा पर पत्नी का नाम दर्ज कराने की यह निःशुल्क योजना पिछड़ रही है और क्या है इसकी प्रक्रिया।
महाराष्ट्र में लक्ष्मी मुक्ति योजना (सोर्स: सोशल मीडिया)
Laxmi Mukti Yojana: ग्रामीण महाराष्ट्र की महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने के संकल्प के साथ शुरू की गई लक्ष्मी मुक्ति योजना आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। वर्ष 1992-93 में तात्कालिक दूरगामी सोच के साथ शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य था महिलाओं को कृषि भूमि में समान अधिकार दिलाना। लेकिन विडंबना यह है कि 30 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी, यह महत्वाकांक्षी योजना प्रशासनिक फाइलों और नागरिकों की उदासीनता के बीच फंसी हुई है।
क्या है लक्ष्मी मुक्ति योजना?
लक्ष्मी मुक्ति योजना का सीधा अर्थ है पति के मालिकाना हक वाली कृषि भूमि के सरकारी दस्तावेज (सातबारा) पर पत्नी का नाम ‘सह-खातेदार’ के रूप में दर्ज करना। यह केवल नाम दर्ज करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि महिलाओं को संपत्ति पर कानूनी अधिकार देकर समाज में उनकी स्थिति को स्वावलंबी और सुरक्षित बनाने की एक बड़ी पहल है।
पूरी तरह निःशुल्क, फिर भी क्यों है दूरी?
इस योजना की सबसे क्रांतिकारी विशेषता इसका पूर्णतः निःशुल्क होना है। सामान्य परिस्थितियों में यदि कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति में किसी का नाम जुड़वाता है, तो उसे भारी स्टाम्प ड्यूटी और पंजीकरण शुल्क देना पड़ता है। लेकिन लक्ष्मी मुक्ति योजना के तहत राज्य सरकार ने स्टाम्प शुल्क और फेरफार (Mutation) प्रविष्टि के लिए लिया जाने वाला प्रशासनिक शुल्क पूरी तरह माफ कर दिया है। सरकार की ओर से इतनी बड़ी आर्थिक छूट के बावजूद अपेक्षित प्रतिसाद न मिलना चिंता का विषय है।
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प्रशासनिक प्रयास और जमीनी हकीकत
योजना में जान फूंकने के लिए सरकार ने 2003 और हाल ही में 2025 में संशोधित आदेश भी जारी किए। 2003 के निर्णय के अनुसार, ग्रामीण घरों को भी पति-पत्नी के संयुक्त नाम पर करने का प्रावधान जोड़ा गया। वहीं, 2025 के नए निर्देशों में सातबारा पर नाम चढ़ाने की प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए विशेष अभियान चलाने की बात कही गई है।
हालांकि, जानकारों का मानना है कि जमीनी स्तर पर पटवारी और स्थानीय प्रशासन की सक्रियता उतनी नहीं है जितनी होनी चाहिए। पूर्व जिला परिषद अध्यक्ष सुरेखा ठाकरे का कहना है कि, केवल आदेश निकालना पर्याप्त नहीं है। प्रशासन को सीधे किसानों से संपर्क कर उनकी शंकाओं और पारंपरिक सामाजिक बाधाओं को दूर करना होगा, तभी महिलाओं को वास्तविक लक्ष्मी मुक्ति मिलेगी।
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नाम जुड़वाने की सरल प्रक्रिया
योजना का लाभ लेने के लिए प्रक्रिया को काफी सरल रखा गया है कि इच्छुक किसान को अपने स्थानीय पटवारी के पास एक निर्धारित आवेदन देना होता है। साथ में पति का सहमति पत्र, आधार कार्ड और विवाह पंजीकरण प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज आवश्यक हैं।
