

Deepali Chavan Suicide Case: अमरावती जिले के मेलघाट व्याघ्र प्रकल्प की वनपरिक्षेत्र अधिकारी दीपाली चव्हाण की मृत्यु से जुड़े मामले में तत्कालीन उपवनसंरक्षक विनोद शिवकुमार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत देते हुए कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से आत्महत्या के लिए उकसाने, प्रेरित करने या जानबूझकर सहायता करने का ऐसा ठोस प्रमाण सामने नहीं आता, जिसका घटना से सीधा और निकट संबंध हो।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधीनस्थ कर्मचारी को काम के संबंध में फटकारना, नोटिस देना या प्रशासनिक कार्रवाई करना अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बनता। इस आधार पर शिवकुमार के खिलाफ दाखिल चार्जशीट रद्द करते हुए उन्हें निर्दोष बरी कर दिया।
विगत पांच वर्ष पूर्व दीपाली चव्हाण ने 25 मार्च 2021 को हरिसाल स्थित सरकारी आवास में खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर लेने से उनकी मृत्यु हो गई थी। मामले में सामने आए पत्रों के आधार पर शिवकुमार पर मानसिक प्रताड़ना और अन्य आरोप लगाए गए थे।
इसके बाद उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की अनेक धाराओं के तहत मामला दर्ज कर चार्जशीट दाखिल की गई थी। रिपोर्ट में दीपाली के गर्भवती होने की भी पुष्टी की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए कहा कि घटना से ठीक पहले आरोपी की ओर से आत्महत्या के लिए उकसाने वाली कोई ठोस परिस्थिति सामने नहीं आई।
अदालत ने यह भी कहा कि अक्टूबर 2020 की एक घटना और मार्च 2021 की मृत्यु के बीच पांच महीने से अधिक का अंतर था, इसलिए दोनों के बीच सीधा संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति सतीशचंद्र शर्मा और कोटिस्वर सिंह की पीठ ने मामले में उपलब्ध सुसाइड नोट, गवाहों के बयान और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का परीक्षण किया।
अदालत ने कहा कि घटना से पहले आरोपी की ओर से ऐसा कोई ठोस कृत्य सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो कि उन्होंने दीपाली चव्हाण को आत्महत्या के लिए उकसाया या प्रेरित किया था। अदालत के अनुसार, केवल आरोप या पूर्व की घटनाओं के आधार पर आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध सिद्ध नहीं किया जा सकता।
दीपाली चव्हाण प्रकरण में पुलिस ने विनोद शिवकुमार के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा के तहत मामला दर्ज कर जांच के बाद चार्जशीट दाखिल की थी। शिवकुमार ने चार्जशीट रद्द करने के लिए अदालत का रुख किया, लेकिन सत्र न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज कर दी।
इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी। वहां से भी राहत नहीं मिलने पर शिवकुमार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।