अकोट बाघ शिकार मामले में बड़ा फैसला, 13 साल फरार महिला आरोपी की जमानत खारिज
Tiger Poaching Case: अकोट वन्यजीव क्षेत्र में साल 2013 में हुए बाघ के अवैध शिकार मामले में मुख्य महिला आरोपी गजेंद्रीबाई उर्फ शीतलबाई पारधी की जमानत अर्जी अकोट विशेष कोर्ट ने खारिज कर दी है।
- Written By: केतकी मोडक
प्रतीकात्मक तस्वीर (सोर्स - सोशल मिडिया)
Bail Denied To Female Accused FleeingFor 13 Years In Amravati: वर्ष 2013 में अकोट वन्यजीव परिक्षेत्र में हुए बहुचर्चित और रोंगटे खड़े कर देने वाले बाघ के अवैध शिकार तथा उसके अंगों की तस्करी के मामले में न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है। अकोट के अतिरिक्त जिला एवं विशेष सत्र न्यायाधीश बी.एम. पाटिल की अदालत ने मामले की मुख्य महिला आरोपी गजेंद्रीबाई उर्फ शीतलबाई पारधी (50) मध्यप्रदेश मंडला जिले के देवरी गांव की निवासी का जमानत आवेदन पूरी तरह से खारिज कर दिया है।
वन्यजीव विभाग हिवरखेड द्वारा दर्ज इस संवेदनशील मामले में सरकारी पक्ष की ओर से दी गई मजबूत दलीलों और पुख्ता सबूतों के आधार पर अदालत ने आरोपी महिला को राहत देने से साफ इनकार कर दिया।
लोहे के जाल में फंसाकर भाले से उतारा था मौत के घाट
वन्यजीव विभाग द्वारा अदालत के समक्ष प्रस्तुत की गई केस डायरी के अनुसार, यह खौफनाक वारदात 1 अगस्त 2013 को अकोट वन्यजीव परिक्षेत्र के विरकुंड क्षेत्र में अंजाम दी गई थी। शातिर आरोपी गजेंद्रीबाई और उसके अन्य शिकारी साथियों ने जंगल में लोहे के घातक जाल (ट्रैप) बिछाकर एक बाघ को बेदर्दी से फंसाया था। जाल में फंसकर असहाय हुए बाघ पर इन शिकारियों ने भालों से ताबड़तोड़ वार कर उसे मौत के घाट उतार दिया।
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इसके बाद वन्यजीव तस्करों ने मृत बाघ की कीमती खाल और हड्डियां शरीर से अलग कर दीं और अपने अन्य नेटवर्क की मदद से उसे हरियाणा निवासी अंतरराष्ट्रीय तस्कर आरोपी रंजीत भाटिया को मोटी रकम में बेच दिया था।
पहचान बदलकर फरारी काट रही थी गजेंद्रीबाई
अदालत में वन विभाग का पक्ष रखते हुए सरकारी वकील अजीत देशमुख ने बताया कि आरोपी महिला वर्ष 2012 से ही विभिन्न वन्यजीव अपराधों के बाद से लगातार फरार चल रही थी। सहायक वनसंरक्षक (मेलघाट व्याघ्र प्रकल्प) के कड़े प्रयासों के चलते हाल ही में उसे मध्यप्रदेश की मंडला जेल से प्रोडक्शन वारंट पर ट्रांजिट रिमांड के तहत महाराष्ट्र लाया गया था, जिसके बाद से वह अकोला केंद्रीय कारागृह में न्यायिक हिरासत में बंद है।
सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने पीठ को अवगत कराया कि इसी मामले में शामिल तीन अन्य सह-आरोपियों मनरू उर्फ चदल पवार, आकाश उर्फ दरकाश चव्हाण तथा खरीदार रंजीत भाटिया को अकोट न्यायालय द्वारा पहले ही दोषी करार देते हुए तीन वर्ष के सश्रम कारावास और 10-10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई जा चुकी है। जांच के दौरान गजेंद्रीबाई ने स्वयं कबूल किया है कि उसने पुलिस से बचने के लिए अपनी असली पहचान छिपाई और मध्यप्रदेश के जंगलों में शरण ली थी।
जमानत मिलने पर फिर फरार होने का था अंदेशा
मामले के जांच अधिकारी एवं सहायक वनसंरक्षक टेकाले के अनुसार, गिरफ्तारी के बाद हुई कड़ाई से पूछताछ में आरोपी महिला ने खुद वन अधिकारियों के समक्ष शिकार की पूरी साजिश और अपनी सक्रिय भूमिका को स्वीकार किया था। इतना ही नहीं, उसने जंगल के उस गुप्त स्थान की शिनाख्त भी करवाई जहां बाघ की खाल और हड्डियां तस्करों को सौंपने से पहले छुपाकर रखी गई थीं।
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सरकारी वकील अजीत देशमुख ने कोर्ट में अंतिम दलील दी कि बाघ ‘वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972’ की अनुसूची-1 में शामिल एक बेहद दुर्लभ और संरक्षित प्राणी है। आरोपी गजेंद्रीबाई का पुराना आपराधिक रिकॉर्ड रहा है और उसके खिलाफ मध्यप्रदेश में भी शिकार के कई मामले दर्ज हैं। ऐसे खतरनाक बैकग्राउंड वाले आरोपी को यदि जमानत का लाभ दिया जाता है, तो उसके दोबारा फरार होने या फिर से वन्यजीवों की हत्या में लिप्त होने की पूरी संभावना बनी रहेगी। दोनों पक्षों के वकीलों की जिरह और दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद न्यायाधीश बी.एम. पाटिल ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया।
