

Akola Cooperative Mill Fund: पश्चिम विदर्भ के कपास उत्पादक किसानों की आर्थिक रीढ़ और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार का बड़ा जरिया रही 'दि नीलकंठ सहकारी सूतगिरणी' को दोबारा शुरू करने का मार्ग अब पूरी तरह साफ हो गया है। महाराष्ट्र शासन के सहकार, विपणन और वस्त्रोद्योग विभाग ने मंगलवार, 9 जून को एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए सूतगिरणी को पुनर्जीवित करने के लिए ₹17 करोड़ 98 लाख 38 हजार की भारी-भरकम निधि को आधिकारिक मंजूरी दे दी है।
इस संबंध में सरकार का आधिकारिक परिपत्र भी जारी कर दिया गया है, जिससे अकोला सहित पूरे विदर्भ के औद्योगिक हलकों में उत्साह का माहौल है।
पश्चिम विदर्भ के इस बेल्ट में कपास का उत्पादन प्रचुर मात्रा में होता है, लेकिन रोजगार के सीमित साधनों के कारण यहां के किसान और युवा हमेशा संघर्ष करते रहे। इसी समस्या को भांपते हुए किसानों के सफेद सोने को सही मूल्य दिलाने और उनकी आर्थिक उन्नति के उद्देश्य से दिवंगत पूर्व राज्यमंत्री नीलकंठ श्रीधर उपाख्य नानासाहब सपकाल ने इस सहकारी सूतगिरणी की नींव रखी थी। इस परियोजना का पंजीकरण 27 अगस्त 1965 को हुआ था। इसके बाद साल 1970 में इसकी कोनशिला रखी गई और ठीक तीन वर्ष बाद यानी 6 अक्टूबर 1973 से यहां सूत का उत्पादन शुरू हो गया था।
बदलते आर्थिक समीकरणों और वित्तीय संकट के चलते 17 मार्च 2008 को इस सूतगिरणी में उत्पादन का काम पूरी तरह ठप हो गया था। आश्चर्य की बात यह है कि पिछले 18 वर्षों से उत्पादन बंद होने के बावजूद इसका प्रशासनिक कार्यालय आज भी सुचारू रूप से चालू है। इस दौरान सूतगिरणी के खाते में साल 1966 से 1989 के बीच कुल 81.10 लाख रुपये का शासकीय पूंजी निवेश हुआ था, जो सरकार को वापस लौटाया जाना बाकी है, लेकिन अब तक इसका भुगतान नहीं किया गया है।
इस बंद पड़ी मिल को दोबारा शुरू करने के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर एक लंबी लड़ाई लड़ी गई। साल 2014 में अकोला जिले से भाजपा विधायक चुने जाने के बाद रणधीर सावरकर ने इसे अपना मुख्य एजेंडा बनाया। विधायक सावरकर, सूतगिरणी के अध्यक्ष डॉ. रणजीत सपकाल और संचालक डॉ. अमित कावरे की तिकड़ी ने शासन स्तर पर विशेष पैकेज और फंड जारी करवाने के लिए लगातार फॉलो-अप किया।
सरकार के इस नए फंड से अब मिल की पुरानी मशीनों को दुरुस्त किया जाएगा और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर जल्द ही मिल के सायरन को दोबारा बजाया जाएगा, जिससे क्षेत्र के हजारों परिवारों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से आजीविका मिलेगी।