

Highlights:
उज्जैन के खड़े हनुमान मंदिर की प्रतिमा की भोपाल से आई विशेषज्ञ टीम ने स्कैनिंग की।
मंदिर का मुख्य ढांचा हटाए जाने के करीब डेढ़ महीने बाद दोबारा तकनीकी जांच हुई।
करीब डेढ़ घंटे तक मशीनों से प्रतिमा के आधार और आसपास की जमीन की जांच की गई।
भाजपा पार्षद शिवेंद्र तिवारी ने जांच की प्रक्रिया और पारदर्शिता पर सवाल उठाए।
IIT इंदौर की टीम भी 15 सितंबर को GPR तकनीक से स्कैनिंग कर चुकी है।
Ujjain Khade Hanuman Temple Statue : उज्जैन में खड़े हनुमान मंदिर की प्राचीन प्रतिमा को हटाने और स्थानांतरित करने का मामला एक बार फिर चर्चा में है। मंदिर का मुख्य ढांचा हटाए जाने के करीब डेढ़ महीने बाद मंगलवार देर शाम भोपाल से विशेषज्ञों की टीम मौके पर पहुंची।
टीम ने आधुनिक मशीनों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मदद से प्रतिमा और उसके आसपास के हिस्से की स्कैनिंग की। जांच का उद्देश्य यह पता लगाना था कि प्रतिमा का आधार जमीन के भीतर कितनी गहराई तक है और उसके नीचे किस तरह की संरचना मौजूद है।
स्मार्ट सिटी से मिली जानकारी के अनुसार, विशेषज्ञों ने करीब एक से डेढ़ घंटे तक विभिन्न उपकरणों से जांच की। टीम ने खड़े हनुमान प्रतिमा के निचले हिस्से और आसपास की जमीन की संरचना को समझने का प्रयास किया। इससे पहले खुदाई के दौरान प्रतिमा का आधार स्पष्ट नहीं हो पाया था और प्रतिमा अपनी जगह से नहीं हिली थी। इसके बाद संरचना का पता लगाने के लिए वैज्ञानिक तकनीक का सहारा लिया गया।
जांच की प्रक्रिया को लेकर भाजपा पार्षद शिवेंद्र तिवारी ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि धार्मिक आस्था से जुड़े संवेदनशील मामले में प्रशासन को पारदर्शिता बरतनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि जांच से संबंधित जानकारी सार्वजनिक नहीं होने के कारण श्रद्धालुओं के बीच असमंजस बना हुआ है। तिवारी ने दावा किया कि जांच के दौरान कुछ उपकरणों की बैटरी डिस्चार्ज हो गई थी। उन्होंने इसे भगवान का संकेत भी बताया। हालांकि, बैटरी डिस्चार्ज होने और इसे किसी संकेत से जोड़ने संबंधी दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
खड़े हनुमान मंदिर को हटाने की कार्रवाई 30 अगस्त 2026 से शुरू करने का प्रयास किया गया था। विरोध के बाद 1 सितंबर को मंदिर का ऊपरी हिस्सा हटाया गया, जबकि 4 सितंबर को मुख्य ढांचा भी हटा दिया गया। उज्जैन प्रशासन की योजना करीब 8 फीट ऊंची प्रतिमा को टंकी चौक के पास नए मंदिर में स्थापित करने की थी। लेकिन प्रतिमा के आधार का पता नहीं चलने और उसे हिला पाने में कठिनाई के कारण स्थानांतरण की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
इससे पहले 15 सितंबर को IIT इंदौर की टीम ने ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (GPR) तकनीक से प्रतिमा के नीचे की संरचना की स्कैनिंग की थी। फिलहाल प्राचीन प्रतिमा को कैनोपी के नीचे सुरक्षित रखा गया है। भोपाल से आई विशेषज्ञ टीम की ताजा जांच के बाद अब आगे की कार्रवाई पर नजर है। श्रद्धालु चाहते हैं कि प्रतिमा के संबंध में कोई भी निर्णय लेते समय धार्मिक आस्था, प्रतिमा की सुरक्षा और तकनीकी जांच के निष्कर्षों को प्राथमिकता दी जाए। फिलहाल प्रशासन की ओर से प्रतिमा को हटाने या स्थानांतरित करने के संबंध में कोई नया निर्णय सार्वजनिक नहीं किया गया है।