

Jabalpur Jewish Cemetery Dispute: मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ क्षेत्र का करीब 100 साल पुराना इकलौता यहूदी कब्रिस्तान एक बार फिर सुर्खियों में है। जबलपुर के रानीताल चौक के आगाचौक इलाके में स्थित यह ऐतिहासिक “आरामगाह” बीते कुछ समय से भू-माफियाओं के कब्जे के प्रयासों को लेकर विवादों में घिरा हुआ है। मामला अब अदालत से लेकर प्रशासन तक पहुंच चुका है और इसे लेकर शहर में चर्चा तेज हो गई है।
जानकारी के अनुसार, अंग्रेजों के समय करीब 200 यहूदी परिवार इस क्षेत्र में बसे थे। कहा जाता है कि ब्रिटिश प्रशासन ने इन परिवारों को लगभग 5 हजार वर्गफीट जमीन दफन स्थल (कब्रिस्तान) के रूप में उपलब्ध कराई थी। समय के साथ यहां लगभग 100 कब्रें बनाई गईं, जिनमें कुछ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की कब्रें भी बताई जाती हैं।
स्थानीय लोगों और यहूदी परिवारों का आरोप है कि बीते कुछ महीनों से भू-माफिया इस जमीन पर कब्जा करने के प्रयास कर रहे हैं और इसके लिए विभिन्न प्रकार के विवाद खड़े किए जा रहे हैं। आरोप यह भी है कि कुछ कब्रों के पत्थरों को नुकसान पहुंचाया गया और ऐतिहासिक निशानों को मिटाने की कोशिश की गई।
विवाद के चलते मामला पहले एसडीएम कोर्ट और फिर जिला न्यायालय तक पहुंचा। दोनों स्तरों पर यह फैसला यहूदी परिवारों के पक्ष में आया है। हालांकि, इसके बावजूद कथित कब्जाधारी इसे निजी भूमि बताते हुए हाईकोर्ट में अपील की तैयारी में हैं। प्रशासन का कहना है कि पूरे मामले की कानूनी प्रक्रिया जारी है।
समय के साथ अधिकांश यहूदी परिवार या तो इजराइल चले गए या अन्य देशों में बस गए। वर्तमान में क्षेत्र में केवल 3 से 4 परिवार ही बचे हैं, जो अपनी ऐतिहासिक विरासत और पूर्वजों की यादों को संरक्षित रखने की कोशिश कर रहे हैं। एक परिवार द्वारा हाल ही में शिकायत दर्ज कराने के बाद प्रशासन ने मामले की जांच शुरू की थी।
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने इस कब्रिस्तान को ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षित करने की मांग की है। उनका कहना है कि यह स्थल न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि शहर के बहुसांस्कृतिक इतिहास का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सरकारी नियमों के अनुसार कब्रिस्तान या श्मशान घाट आमतौर पर शासकीय भूमि पर ही बनाए जाते हैं। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि यह भूमि निजी थी तो इतने वर्षों तक किसी ने आपत्ति क्यों नहीं की। फिलहाल यह ऐतिहासिक स्थल कानूनी विवाद, भू-माफिया के आरोपों और संरक्षण की मांग के बीच चर्चा का केंद्र बना हुआ है।