भोजशाला विवाद में नया मोड़, अब जैन समाज ने ठोका दावा; हाईकोर्ट में जैन समाज की एंट्री से गरमाया मुद्दा
Madhya Pradesh News: धार भोजशाला को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में चल रही सुनवाई अब नए मोड़ पर पहुंच गई है। इस विवाद में जैन समाज की एंट्री से कानूनी और धार्मिक बहस और तेज हो गई है।
- Written By: सजल रघुवंशी
भोजशाला विवाद में जैन समाज की एंट्र (सोर्स- सोशल मीडिया)
Jainism Entry In Bhojshala Case: मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में चल रही सुनवाई अब नए मोड़ पर पहुंच गई है। इस बहुचर्चित विवाद में जैन समाज की एंट्री से कानूनी और धार्मिक बहस और तेज हो गई है। जैन समाज की ओर से दायर जनहित याचिका में दावा किया गया है कि भोजशाला मूल रूप से जैन धरोहर है, जहां प्राचीन काल में जैन गुरुकुल और मंदिर संचालित होते थे।
इस मामले में बुधवार को इंदौर खंडपीठ में सुनवाई के दौरान जैन समाज की ओर से दिनेश प्रसाद राजभर ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अपना पक्ष रखा। उन्होंने ऐतिहासिक दस्तावेजों और प्राचीन संदर्भों का हवाला देते हुए अदालत को बताया कि राजा भोज ने यह भूमि जैन आचार्य मानतुंग को दान में दी थी। मानतुंग वही आचार्य माने जाते हैं, जिन्होंने जैन धर्म के प्रसिद्ध स्तोत्र ‘भक्तामर स्तोत्र’ की रचना की थी।
भोजशाला मामले में जैन पक्ष की एंट्री
सुनवाई के दौरान अदालत ने जैन समाज की जनहित याचिका को मुख्य याचिका के साथ टैग कर दिया। इसके साथ ही भोजशाला विवाद में जैन पक्ष की कानूनी भागीदारी औपचारिक रूप से दर्ज हो गई है और उसका पक्ष अब अधिक मजबूत होकर सामने आएगा।
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एएसआई पर लगाए सबूतों की अनदेखी के आरोप
इस मामले में जैन समाज की ओर से अधिवक्ता प्रिया जैन ने मीडिया से बातचीत में दावा किया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की हालिया सर्वे रिपोर्ट में भोजशाला से जुड़े जैन साक्ष्यों को नजरअंदाज किया गया है। प्रिया जैन के मुताबिक एएसआई की खुदाई और सर्वे के दौरान भोजशाला परिसर से जैन तीर्थंकरों और यक्ष-यक्षणियों की कई खंडित मूर्तियां मिलीं। हालांकि, उनका आरोप है कि एएसआई ने अपनी रिपोर्ट में इन अवशेषों को स्पष्ट रूप से जैन धर्म से संबंधित नहीं बताया।
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जैन पक्ष ने इन तथ्यों दिया हवाला
अधिवक्ता प्रिया जैन के अनुसार सर्वे के दौरान सात फणों वाली ‘सप्त फणी कैनोपी’ संरचना भी सामने आई है, जिसे जैन प्रतीकों से जुड़ा माना जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जैन समाज की यह पहल किसी धर्म के विरोध में नहीं बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों और संवैधानिक अधिकारों के आधार पर की जा रही है। जैन समाज का यह भी दावा है कि लंदन में संरक्षित वाग्देवी प्रतिमा और उससे जुड़े शिलालेख भोजशाला के जैन इतिहास की पुष्टि करते हैं। इन्हीं तथ्यों को आधार बनाते हुए समाज ने हाई कोर्ट से भोजशाला परिसर में पूजा-अर्चना के समान अधिकार देने की मांग की है।
