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भांडेर में गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल: 37 ताजियों ने कृष्ण मंदिर के सामने दी सलामी, 200 साल पुरानी है ये परंपरा

Chaturbhuj Narayan Temple Bhander: 200 साल पुरानी परंपरा के तहत मोहर्रम पर 37 ताजियों ने चतुर्भुज नारायण मंदिर के सामने सलामी दी। मंदिर के पुजारियों ने फूलमालाओं से स्वागत कर एकता की मिसाल पेश की।

  • Reported By: निशांत तिवारी | Edited By: प्रीतेश जैन
Updated On: Jun 27, 2026 | 11:30 AM

मंदिर के सामने सलामी देते ताजिये (फोटो सोर्स- नवभारत)

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Bhander Ganga Jamuni Tehzeeb: दतिया जिले के भांडेर कस्बे में मोहर्रम के अवसर पर एक बार फिर गंगा-जमुनी तहजीब की अनूठी मिसाल देखने को मिली। यहां करीब 200 सालों से चली आ रही परंपरा के तहत मोहर्रम के जुलूस में शामिल 37 ताजियों ने प्रसिद्ध चतुर्भुज नारायण मंदिर के सामने रुककर भगवान को सलामी दी। वहीं मंदिर के पुजारियों ने ताजियों पर फूलमालाएं अर्पित कर उनका भव्य स्वागत किया। इस दौरान हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोगों ने आपसी भाईचारे और सामाजिक सौहार्द का संदेश दिया।

शुक्रवार रात निकले मोहर्रम के पारंपरिक जुलूस में शामिल सभी 37 ताजिए अपने निर्धारित मार्ग से होते हुए चतुर्भुज नारायण मंदिर पहुंचे। यहां ताजियों ने भगवान चतुर्भुज नारायण को पारंपरिक सलामी दी। मंदिर परिसर में मौजूद पुजारियों और श्रद्धालुओं ने पूरे सम्मान के साथ ताजियों पर फूल बरसाए और मालाएं पहनाकर उनका स्वागत किया।

एक-दूसरे के धार्मिक आयोजनों में शामिल होते हैं दोनों समुदाय

यह परंपरा केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि भांडेर की साझा संस्कृति और आपसी विश्वास की पहचान बन चुकी है। वर्षों से दोनों समुदाय एक-दूसरे के धार्मिक आयोजनों में सम्मानपूर्वक भाग लेते रहे हैं, जिससे सामाजिक एकता और भाईचारे की भावना मजबूत होती रही है।

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200 साल पुराना इतिहास

स्थानीय लोगों के अनुसार, चतुर्भुज नारायण मंदिर का इतिहास भी हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल है। मान्यता है कि कई साल पहले सोंतलाई तालाब से भगवान चतुर्भुज नारायण की प्रतिमा स्थानीय मुस्लिम हजारी परिवार को मिली थी। इसके बाद हजारी परिवार ने मंदिर की स्थापना कराई और उसके रखरखाव के लिए भूमि भी दान की।

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हजारी परिवार की मौजूदगी में होते थे धार्मिक आयोजन

बुजुर्ग बताते हैं कि आजादी से पहले तक किसी भी धार्मिक आयोजन की शुरुआत तब तक नहीं होती थी, जब तक हजारी परिवार का कोई सदस्य वहां उपस्थित न हो। एक बार परिवार में केवल एक बुजुर्ग महिला बची थीं, जो गंभीर रूप से बीमार थीं। तब उन्हें पालकी में बैठाकर मंदिर लाया गया और उनके आशीर्वाद के बाद ही धार्मिक आयोजन आगे बढ़ा। यह घटना आज भी भांडेर की सांप्रदायिक सौहार्द की अमिट पहचान मानी जाती है। भांडेर की यह परंपरा आज भी देश को यह संदेश देती है कि आपसी सम्मान, विश्वास और भाईचारे से समाज की असली ताकत बनी रहती है।

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Published On: Jun 27, 2026 | 11:30 AM

Topics:  

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