

Pratima Bagri Caste Certificate Row: मध्य प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी का जाति प्रमाण पत्र इन दिनों भारी विवादों के घेरे में है। उन पर आरोप है कि उन्होंने अपनी कुर्सी बचाने और अनुसूचित जाति (एससी) का दर्जा बरकरार रखने के लिए 'छुआछूत' जैसी कुप्रथा को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया है।
राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र को लेकर लंबे समय से सवाल उठ रहे थे। कांग्रेस अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ के अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने शिकायत दर्ज कराई थी कि मंत्री का जाति प्रमाण पत्र अवैध है। इस शिकायत के बाद मामले की जांच के लिए उच्च स्तरीय छानबीन समिति का गठन किया गया था।
समिति के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए मंत्री प्रतिमा बागरी ने खुद को एससी वर्ग का बताया। अपने बचाव में उन्होंने चौंकाने वाला तर्क दिया कि आज भी ब्राह्मण, ठाकुर और राजपूत जैसी ऊंची जातियां उनसे भेदभाव करती हैं और उनके घरों में भोजन तक नहीं करती हैं। उन्होंने दावा किया कि यही छुआछूत इस बात का प्रमाण है कि वे किसी ऊंची जाति (ठाकुर या राजपूत) की नहीं, बल्कि अनुसूचित जाति से आती हैं।
मंत्री प्रतिमा बागरी ने समिति के समक्ष अपने पक्ष में 110 साल पुराने राजस्व अभिलेख और प्रयागराज के पंडों से प्राप्त वंशावली सहित 20 से अधिक साक्ष्य पेश किए। उन्होंने वर्ष 1916 के परदादा रामगोपाल बागरी के समय के दस्तावेज भी दिए। इन साक्ष्यों और आदिम जाति अनुसंधान संस्थान के अध्ययन के आधार पर समिति ने माना कि बागरी जाति का राजपूतों के साथ कोई रोटी-बेटी का रिश्ता नहीं है। अंततः समिति ने नागौद के अनुविभागीय अधिकारी द्वारा 7 फरवरी 2004 को जारी प्रमाण पत्र को वैध ठहराते हुए मंत्री को क्लीन चिट दे दी।
इस पूरे विवाद पर मंत्री प्रतिमा बागरी ने एक अजीबोगरीब सफाई दी है। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि यदि शराब के गिलास में चाय डाल दी जाए, तो क्या लोग उसे चाय कहेंगे या शराब?" उनका यह बयान अब चर्चा का विषय बन गया है। शिकायतकर्ता प्रदीप अहिरवार ने समिति के इस फैसले को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि वे इस मामले को हाई कोर्ट में चुनौती देंगे। देखना यह होगा कि कोर्ट के स्तर पर यह मामला क्या नया मोड़ लेता है।
समिति के फैसले के बाद भी विवाद थमा नहीं है। विपक्षी दल और स्थानीय लोग इस पर सवाल उठा रहे हैं: