मंत्री प्रतिमा बागरी को क्लीन चिट पर कांग्रेस के सवाल, बोले- सरकार के दबाव में बदला फैसला, हाईकोर्ट जाएंगे

SC Certificate Case: राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के SC प्रमाण पत्र को क्लीन चिट मिलने पर कांग्रेस ने सवाल उठाए हैं। प्रदीप अहिरवार ने सरकार पर दबाव डालने का आरोप लगाते हुए HC जाने की बात कही है।
Pratima Bagri SC Certificate Case
कांग्रेस की पीसी (फोटो सोर्स- नवभारत)
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Pratima Bagri SC Certificate Case: मध्य प्रदेश सरकार की राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के अनुसूचित जाति (एससी) प्रमाण पत्र को राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति द्वारा वैध घोषित किए जाने के बाद विवाद एक बार फिर गहरा गया है। कांग्रेस ने समिति के फैसले पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि जांच निष्पक्ष तरीके से नहीं की गई और सरकार के दबाव में महत्वपूर्ण दस्तावेजों तथा ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी कर मंत्री को क्लीन चिट दे दी गई। कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष एवं शिकायतकर्ता प्रदीप अहिरवार ने कहा कि वह इस फैसले को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती देंगे और जरूरत पड़ी तो सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे।

भोपाल में आयोजित प्रेस वार्ता में प्रदीप अहिरवार ने कहा कि उनकी शिकायत पूरी तरह दस्तावेजी साक्ष्यों पर आधारित थी, लेकिन जांच समिति ने उन पर पर्याप्त विचार नहीं किया। उन्होंने आरोप लगाया कि जांच के दौरान मंत्री प्रतिमा बागरी अन्य मंत्रियों के साथ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मिली थीं, जिसके बाद जांच की दिशा प्रभावित हुई। उनके अनुसार इससे पूरे मामले की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।

महत्वपूर्ण दस्तावेजों को महत्व नहीं दिया

अहिरवार ने दावा किया कि समिति ने संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश-1950, वर्ष 1961 और 1971 की जनगणना के रिकॉर्ड, ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI) की वर्ष 1998-99 की मानवशास्त्रीय रिपोर्ट तथा 2007 के राजपत्र जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों को अपने निर्णय में पर्याप्त महत्व नहीं दिया। उनका कहना है कि यदि इन दस्तावेजों का गंभीरता से परीक्षण किया जाता तो निष्कर्ष अलग हो सकता था।

बागरी समुदाय ST की सूची में शामिल नहीं था

कांग्रेस नेता के अनुसार 1950 के अनुसूचित जाति आदेश में जिस क्षेत्र में प्रतिमा बागरी का परिवार निवास करता था, वहां बागरी समुदाय अनुसूचित जाति की सूची में शामिल नहीं था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि वर्ष 1961 और 1971 की जनगणना में परिवार ने स्वयं को अनुसूचित जाति के रूप में दर्ज नहीं कराया था। वहीं, TRI की रिपोर्ट में विंध्य और बुंदेलखंड क्षेत्र के बागरी समुदाय को राजपूत/ठाकुर की उपजाति बताया गया है। उनका कहना है कि वर्ष 1976 में पूरे प्रदेश के लिए संयुक्त अनुसूचित जाति सूची लागू होने के बाद ऐसे क्षेत्रों के लोगों ने भी अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र बनवाने शुरू कर दिए, जहां पहले यह दर्जा लागू नहीं था।

देखभाल समिति की तरह काम किया

प्रदीप अहिरवार ने आरोप लगाया कि राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति ने जांच एजेंसी की तरह नहीं, बल्कि "देखभाल समिति" की तरह काम किया और मंत्री को बचाने के लिए संवैधानिक प्रावधानों तथा सरकारी दस्तावेजों की अनदेखी की। उन्होंने कहा कि अब पूरे मामले में न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाएगा, ताकि सभी दस्तावेजों और तथ्यों की निष्पक्ष समीक्षा हो सके।

समिति ने दी क्लीन चिट

गौरतलब है कि राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति पहले ही मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र को वैध घोषित कर चुकी है। ऐसे में अब इस मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया और न्यायालय का निर्णय महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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