

Moong Procurement Madhya Pradesh: मध्य प्रदेश में ग्रीष्मकालीन मूंग की सरकारी खरीद शुरू होते ही किसानों का विरोध तेज हो गया है। किसानों का आरोप है कि सरकारी पोर्टल पर पंजीयन के लिए निर्धारित कोटा बेहद कम रखा गया है, जिससे बड़ी संख्या में किसान अपनी पूरी उपज का पंजीयन नहीं करा पा रहे हैं।
उनका कहना है कि सरकार ने प्रति एकड़ तीन क्विंटल खरीदी का लक्ष्य तय किया है, लेकिन पोर्टल पर केवल 1.2 से 1.25 क्विंटल प्रति एकड़ की ही एंट्री हो रही है। किसानों के अनुसार पिछले वर्ष यह सीमा 4.8 क्विंटल प्रति एकड़ थी, जिससे इस बार की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
पंजीयन की समस्या का सीधा असर किसानों की आय पर पड़ रहा है। मूंग का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 8,798 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित है, लेकिन सीमित खरीदी और पंजीयन में दिक्कतों के कारण किसानों को मंडियों और खुले बाजार में अपनी फसल 6,500 से 7,200 रुपये प्रति क्विंटल तक बेचनी पड़ रही है। यानी किसानों को प्रति क्विंटल 1,200 से 1,500 रुपये तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है। किसानों का कहना है कि इस वर्ष अच्छी पैदावार के बावजूद उचित मूल्य नहीं मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति पर गंभीर असर पड़ रहा है।
सरकारी खरीदी व्यवस्था के विरोध में हरदा जिले के किसान स्थायी धरने पर बैठ गए हैं। वहीं नर्मदापुरम और रायसेन सहित अन्य जिलों के किसानों ने भी चेतावनी दी है कि यदि खरीदी का कोटा नहीं बढ़ाया गया तो बड़े स्तर पर आंदोलन किया जाएगा। रायसेन के उदयपुरा निवासी किसान शुभम रघु का कहना है कि बंपर उत्पादन के बावजूद पंजीयन नहीं हो पाने से किसानों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है। भारतीय किसान संघ के प्रदेश अध्यक्ष सर्वज्ञ दीवान ने भी कहा कि मौजूदा व्यवस्था से हजारों किसानों को लाखों रुपये का नुकसान होने की आशंका है।
मामले को गंभीर मानते हुए प्रदेश के कृषि मंत्री ऐदल सिंह कंषाना ने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर मूंग खरीदी का कोटा बढ़ाने की मांग की है। उन्होंने केंद्र सरकार से वर्तमान 4.55 लाख मीट्रिक टन की सीमा को बढ़ाकर 8.06 लाख मीट्रिक टन, यानी कुल उत्पादन का 40 प्रतिशत करने का आग्रह किया है। मंत्री ने पत्र में उल्लेख किया है कि इस बार प्रदेश में मूंग की उत्पादकता लगभग 1,410 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रहने का अनुमान है, इसलिए पुरानी खरीदी सीमा किसानों के हितों के अनुरूप नहीं है। अब किसानों की नजर केंद्र सरकार के फैसले पर टिकी है, जिससे उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य मिल सके।
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