राज्यसभा सीट विवाद पर MP कांग्रेस में बढ़ी हलचल, नामांकन निरस्त होने के बाद 7 बड़े नेताओं पर उठे सवाल
MP Rajya Sabha Election : मध्यप्रदेश में राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस उम्मीदवार का नामांकन निरस्त होने के बाद पार्टी में हलचल बढ़ गई है। संगठन, रणनीति और समन्वय को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं।
- Reported By: सुधीर दंडोतिया | Edited By: प्रीतेश जैन
कांग्रेस नेता (फोटो सोर्स- नवभारत)
MP Congress Rajya Sabha Seat Controversy: मध्यप्रदेश में राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त होने के बाद पार्टी के भीतर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इस घटनाक्रम को लेकर कांग्रेस संगठन की रणनीति, कानूनी तैयारी और नेताओं के बीच समन्वय पर सवाल उठ रहे हैं।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, राज्यसभा की जिस सीट को कांग्रेस अपने खाते में मानकर चल रही थी, वह नामांकन निरस्त होने के बाद हाथ से निकल गई। इसके बाद प्रदेश कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं की भूमिका को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।
संगठन और समन्वय पर उठे सवाल
राजनीतिक गलियारों में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार, पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ, वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह, प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी और चुनावी मामलों से जुड़े पदाधिकारियों की भूमिका को लेकर चर्चाएं तेज हैं। हालांकि पार्टी की ओर से किसी नेता की जिम्मेदारी तय करने संबंधी कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
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कटघरे में कांग्रेस के ये 7 नेता
मीनाक्षी नटराजन (उम्मीदवार): राहुल गांधी की बेहद करीबी और खुद उम्मीदवार होने के बावजूद वे अपने नामांकन को लेकर आवश्यक सतर्कता और कानूनी सावधानी नहीं बरत सकीं, जिससे पूरी पार्टी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा।
जीतू पटवारी (प्रदेशाध्यक्ष): प्रदेश संगठन के मुखिया होने के नाते उन पर अतिरिक्त जिम्मेदारी थी, लेकिन वे भाजपा की रणनीतिक चाल और ‘क्रॉस वोटिंग’ के जाल को समय रहते भांपने में पूरी तरह नाकाम रहे।
उमंग सिंघार (नेता प्रतिपक्ष): विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के नाते विधायकों को एकजुट रखने और चुनावी प्रक्रिया पर नजर रखने की मुख्य जिम्मेदारी इनकी थी, लेकिन वे आलाकमान की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे।
दिग्विजय सिंह: मीनाक्षी नटराजन के नाम का ऐलान होते ही उनके समर्थकों ने सार्वजनिक रूप से विरोध शुरू कर दिया। जब पार्टी संकट में थी, तब उनके एक समर्थक द्वारा उन्हें (दिग्विजय सिंह को) सीएम बनाने की मांग उठाने से केंद्रीय नेतृत्व और असहज हो गया।
कमलनाथ: पूर्व मुख्यमंत्री और सबसे वरिष्ठ विधायक होने के बावजूद वे समर्थन व्यक्त करने के लिए बुलाई गई कांग्रेस विधायक दल (CLP) की शारीरिक बैठक में शामिल नहीं हुए (केवल वर्चुअली जुड़े)। वहीं, उनके एक समर्थक विधायक ने एयरपोर्ट पर इंतजार कराए जाने को लेकर अपनी ही पार्टी पर सरेआम गुस्सा निकाला।
हरीश चौधरी (प्रदेश प्रभारी): राज्य के बड़े नेताओं के बीच समन्वय बनाने में पूरी तरह विफल रहे। नामांकन निरस्त होने की रात प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने दिग्विजय सिंह को सार्वजनिक रूप से टोकते हुए कह दिया कि “अब आप रहने दीजिए, हम कर लेंगे”, जिससे पार्टी की आपसी फूट उजागर हो गई।
जेपी धनोपिया (चुनाव मामलों के प्रभारी): वरिष्ठ अधिवक्ता और ढाई दशक से ज्यादा का चुनावी मामलों का अनुभव होने के बावजूद वे नामांकन पत्र की इतनी बड़ी तकनीकी और कानूनी चूक को पकड़ने में चूक गए।
नामांकन निरस्त होने के बाद बढ़ी सियासी बयानबाजी
नामांकन निरस्त होने के बाद कांग्रेस नेताओं ने चुनावी प्रक्रिया और फैसले पर सवाल उठाए हैं। वहीं भाजपा ने इसे कांग्रेस की संगठनात्मक और कानूनी चूक बताया है। दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है।
कार्यकर्ताओं ने शुरू किए प्रदर्शन
मामले को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने विभिन्न जिलों में प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। युवा कांग्रेस और अन्य संगठनों ने निर्वाचन प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए विरोध प्रदर्शन किए हैं। कई स्थानों पर भाजपा कार्यालयों के बाहर भी प्रदर्शन किए गए हैं।
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पार्टी के सामने संगठनात्मक चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्यसभा सीट का नुकसान कांग्रेस के लिए केवल चुनावी झटका नहीं, बल्कि संगठनात्मक चुनौती भी है। आने वाले दिनों में पार्टी नेतृत्व को संगठन में समन्वय बनाए रखने और कार्यकर्ताओं के बीच संदेश देने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल कांग्रेस की ओर से इस पूरे घटनाक्रम को लेकर आगे की रणनीति पर मंथन जारी है।
