

नलखेड़ा का मां बगलामुखी मंदिर तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध।
मान्यता है, महाभारत काल में युधिष्ठिर ने की थी पूजा।
मां बगलामुखी को पीला रंग प्रिय, भक्त चढ़ाते हैं पीली सामग्री।
कोर्ट-कचहरी, शत्रु बाधाओं और विजय की कामना से आते हैं श्रद्धालु।
Nalkheda Maa Baglamukhi Temple History: मध्य प्रदेश के आगर-मालवा जिले में लखुंदर नदी के तट पर स्थित नलखेड़ा का मां बगलामुखी मंदिर न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया में अपनी तांत्रिक सिद्धियों और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है।
यह मंदिर दुनिया के उन गिने-चुने तीन स्थानों में से एक है, जहां मां बगलामुखी की स्वयंभू प्रतिमा विराजमान है। आइए जानते हैं इस मंदिर के बारे में और विस्तार से।
मान्यता है कि इस मंदिर की स्थापना स्वयं महाराज युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण के निर्देश पर की थी। महाभारत युद्ध के दौरान जब पांडव संकट में थे, तब भगवान कृष्ण ने उन्हें विजयी होने के लिए यहां मां बगलामुखी की आराधना करने की सलाह दी थी। कहा जाता है कि युधिष्ठिर ने यहां ‘पीत’ (पीले) रंग की पूजन सामग्री से मां को प्रसन्न किया, जिसके बाद उन्हें विजय का वरदान मिला.
नलखेड़ा का यह मंदिर प्राचीन काल से ही तंत्र साधना का केंद्र रहा है। यहां स्थापित मां बगलामुखी की प्रतिमा पीतांबर स्वरूप में है। प्रतिमा के हाथ में गदा है और वे शत्रु की जिह्वा (जीभ) पकड़े हुए हैं। मंदिर के चारों ओर की नक्काशी और इसके गुंबद की बनावट में प्राचीन भारतीय वास्तुकला की झलक मिलती है। मंदिर के सामने एक प्राचीन दीपमाला बनी हुई है, जिसे नवरात्र के समय प्रज्वलित किया जाता है।
दस महाविद्याओं में से एक, मां बगलामुखी को ‘पीतांबरा’ भी कहा जाता है क्योंकि उन्हें पीला रंग अत्यंत प्रिय है। यहां आने वाले भक्त पीले वस्त्र धारण करते हैं और पीले फूल, पीली चूड़ियाँ और पीली मिठाई अर्पित करते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां विधि-विधान से ‘अनुष्ठान’ कराने पर कोर्ट-कचहरी के मामलों, शत्रुओं के षड्यंत्रों और राजनीतिक बाधाओं से मुक्ति मिलती है। यही कारण है कि यहाँ अक्सर बड़े राजनेता, अभिनेता और विशिष्ट जन अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए यज्ञ कराते देखे जाते हैं।
मंदिर के पास बहने वाली लखुंदर नदी के बारे में कहा जाता है कि इसका जल कभी नहीं सूखता। मंदिर प्रांगण में एक प्राचीन बिल्व पत्र का वृक्ष और गणेश जी की प्रतिमा भी स्थापित है। तांत्रिकों और साधकों के लिए यह स्थान सिद्ध पीठ माना जाता है, जहां आधी रात को की गई साधना विशेष फलदायी होती है। यहां की आरती का अनुभव दिव्य होता है, जो भक्तों को आत्मिक शांति प्रदान करता है।