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कागज पर समानता या हकीकत में इंसाफ? Zero Discrimination Day पर जानें वो अधिकार जो देते हैं सुरक्षा कवच

Rights In India: हर साल 1 मार्च को Zero Discrimination Day मनाया जाता है जिसका उद्देश्य समाज में समानता, सम्मान और भेदभाव मुक्त माहौल को बढ़ावा देना है।

  • Written By: प्रीति शर्मा
Updated On: Mar 01, 2026 | 03:39 AM

समानता का संदेश देता पोस्टर पकड़े लोग (सौ. एआई)

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Zero Discrimination Day: लोकतंत्र की बुनियाद समानता पर टिकी है लेकिन हकीकत के धरातल पर आज भी रंग, जाति, लिंग और स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर भेदभाव की दीवारें ऊंची हैं। Zero Discrimination Day पर आइए विश्लेषण करें कि कानून की किताबें आपको क्या हक देती हैं और असल बदलाव कहां अटका है।

हर साल 1 मार्च को दुनिया भर में शून्य भेदभाव दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरुआत संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा 2014 में की गई थी जिसका मुख्य उद्देश्य एड्स (HIV) से प्रभावित लोगों के खिलाफ होने वाले भेदभाव को रोकना था। लेकिन आज यह दिन हर उस इंसान की आवाज बन गया है जिसे उसकी पहचान, शारीरिक स्थिति या पृष्ठभूमि के कारण समाज में पीछे धकेला जाता है।

सवाल यह है कि क्या सब बराबर हैं का नारा सिर्फ फाइलों तक सीमित है। भारत जैसे देश में जहां विविधता ही खूबसूरती है वहां भेदभाव के खिलाफ हमारा संविधान सबसे मजबूत सुरक्षा कवच प्रदान करता है।

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संविधान सबसे बड़ी ताकत

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ही समता का जिक्र है। मुख्य रूप से ये तीन अनुच्छेद हर नागरिक को बराबरी का अहसास कराते हैं।

अनुच्छेद 14

यह सुनिश्चित करता है कि कानून की नजर में एक आम नागरिक और एक रसूखदार व्यक्ति दोनों बराबर हैं। किसी को भी विशेष छूट नहीं दी जा सकती।

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प्रतीकात्मक तस्वीर (सौ. फ्रीपिक)

अनुच्छेद 15

यह राज्य को सख्त निर्देश देता है कि धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा।

अनुच्छेद 17

यह अस्पृश्यता (छुआछूत) को जड़ से खत्म करता है। इसका किसी भी रूप में आचरण करना एक गंभीर कानूनी अपराध है।

कार्यस्थल और समाज में शून्य सहनशीलता

सिर्फ संविधान ही नहीं बल्कि कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न (POSH) अधिनियम और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 जैसे कानून विशेष रूप से कमजोर वर्गों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। इसके बावजूद मेंटल हेल्थ या जेंडर के आधार पर होने वाला माइक्रो-अग्रेसिव भेदभाव आज भी एक बड़ी चुनौती है।

कानून से बढ़कर है सोच का बदलाव

शून्य भेदभाव का मतलब सिर्फ कानून का डर नहीं बल्कि एक ऐसी समावेशी सोच का निर्माण करना है जहां व्यक्ति का मूल्यांकन उसके चरित्र और योग्यता से हो न कि उसकी पहचान से। असली इंसाफ तब होगा जब समाज का आखिरी व्यक्ति भी बिना किसी हिचकिचाहट के अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सके। इस 1 मार्च को संकल्प लें कि हम न केवल अपने अधिकारों को जानेंगे बल्कि दूसरों के प्रति भी सम्मानजनक नजरिया रखेंगे।

Zero discrimination day 2026 legal rights and equality in india

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Published On: Mar 01, 2026 | 03:39 AM

Topics:  

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