विश्व ब्रेल दिवस 2026: 6 बिंदुओं का वो जादुई कोड जिसने बदली नेत्रहीनों की दुनिया, जानिए इतिहास
World Braille Day 2026: विश्व ब्रेल दिवस हर साल 4 जनवरी को लुईस ब्रेल की याद में मनाया जाता है। महज 12 साल की उम्र में उन्होंने एक ऐसी लिपि की नींव रखी, जो दृष्टिहीनों के लिए उजाला थी।
- Written By: दीपिका पाल
विश्व ब्रेल दिवस ( सौ.सोशल मीडिया)
World Braille Day 2026: आंखें, हर किसी के जीवन का नजरिया है तो वहीं पर इसके बिना व्यक्ति अपने जीवन की कल्पना नहीं कर सकता है।एक समय ऐसा भी था जब नेत्रहीन लोग पढ़ने और लिखने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। उनके लिए दुनिया सिर्फ ध्वनियों और स्पर्श तक सीमित थी, लेकिन लुईस ब्रेल ने बहुत कम उम्र में ही एक ऐसी लिपि बनाई जिसकी मदद से दृष्टिबाधित लोग भी आज पढ़ और लिख सकते हैं।
यह कोई साधारण उपलब्धि नहीं थी, क्योंकि इसे कई सालों तक समाज और संस्थानों द्वारा स्वीकार नहीं किया गया था। लेकिन उनके दृढ़ संकल्प और मेहनत ने दुनिया को पहुंचाया है।
बचपन में हुआ था हादसा बदली जिंदगी
लुईस ब्रेल का जन्म फ्रांस के कुप्रे (Coupvray) गांव में 4 जनवरी 1809 को हुआ था। वे एक साधारण मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे थे। उनके पिता घोड़ों की जीन बनाने का काम करते थे। परिवार की आर्थिक तंगी के कारण नन्हे लुईस ने बचपन से ही अपने पिता के काम में हाथ बंटाना शुरू कर दिया था। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। महज 3 साल की उम्र में पिता की वर्कशॉप में खेलते समय एक नुकीला औजार (चाकू जैसा) उनकी एक आंख में घुस गया। सही इलाज न मिल पाने के कारण इन्फेक्शन दूसरी आंख में भी फैल गया और 8 साल की उम्र तक आते-आते लुईस पूरी तरह नेत्रहीन हो गए।
सम्बंधित ख़बरें
सिर्फ नींद की कमी नहीं ये 5 कारण भी बन सकते हैं डार्क सर्कल्स की वजह, आज ही हो जाएं सावधान!
बदल गई डेटिंग की दुनिया! Baddie से लेकर Paglu तक; जानें Gen Z के इन वायरल शब्दों का मतलब
फ्लॉलेस स्किन का जापानी फॉर्मूला! बस इन आसान स्टेप्स को फॉलो करने से आएगा चेहरे पर गजब का निखार
सावधान! क्या आप भी गलत समय पर पीते हैं लस्सी? फायदे की जगह शरीर को झेलने पड़ सकते हैं ये गंभीर नुकसान
तो फिर ऐसे हुआ ब्रेल लिपि का अविष्कार
आंखें खोने के बाद लुईस को नेत्रहीनों के स्कूल में दाखिला मिला। जब लुईस 12 साल के थे, तब उन्हें पता चला कि फ्रांसीसी सेना के लिए ‘नाइट राइटिंग’ नामक एक खास कूटलिपि बनी है, जिससे सैनिक अंधेरे में गुप्त संदेश पढ़ सकते थे। लुईस इस विचार से बेहद प्रभावित हुए। उन्होंने अपने स्कूल के पादरी के माध्यम से इस कूटलिपि को विकसित करने वाले कैप्टन चार्ल्स बार्बर से मुलाकात की। यहीं से उनके मन में नेत्रहीनों के लिए एक सरल लिपि बनाने का विचार आया। उन्होंने सेना की जटिल कूटलिपि को सुधारना शुरू किया और साल 1829 तक मात्र 6 बिंदुओं पर आधारित ‘ब्रेल लिपि’ तैयार कर ली।
क्या होती है ब्रेल लिपि और कैसे करती है काम?
ब्रेल वास्तव में कोई भाषा नहीं, बल्कि एक विशेष कोड (Alphabetical Code) होता है। इसमें उभरे हुए 6 बिंदुओं की पंक्तियों का उपयोग किया जाता है। इन बिंदुओं को अलग-अलग संयोजनों में व्यवस्थित करके अक्षर, संख्याएं और विराम चिह्न बनाए जाते हैं। उंगलियों के पोरों से इन उभरे हुए बिंदुओं को छूकर नेत्रहीन व्यक्ति बड़ी आसानी से पढ़ सकते हैं। आधुनिक युग में यह तकनीक इतनी उन्नत हो गई है कि अब ब्रेल लिपि का उपयोग कंप्यूटर कीबोर्ड और स्मार्टफोन के सॉफ्टवेयर में भी व्यापक रूप से किया जा रहा है।
ये भी पढ़ें- सिर्फ फिजिकल स्ट्रेंथ ही नहीं मेंटली स्ट्रॉन्ग रखता है ये मूवमेंट, बस जानिए इसे करने का आसान तरीका
मान्यता के लिए लंबा इंतजार और मरणोपरांत सम्मान
हैरानी की बात यह है कि जिस लिपि ने करोड़ों जिंदगियां बदलीं, उसे लुईस के जीवित रहते कभी आधिकारिक मान्यता नहीं मिली। शिक्षाविदों ने लंबे समय तक इसे अपनाने से इनकार किया। लुईस ब्रेल की मृत्यु के लगभग सौ साल बाद दुनिया ने उनके योगदान को समझा। जब उनकी महत्ता सिद्ध हुई, तब उनके पार्थिव अवशेषों को राष्ट्रीय ध्वज में लपेटकर पूरे राजकीय सम्मान के साथ दफनाया गया। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने नवंबर 2018 में आधिकारिक रूप से 4 जनवरी को विश्व ब्रेल दिवस घोषित किया और पहला अंतरराष्ट्रीय ब्रेल दिवस 4 जनवरी 2019 को मनाया गया।
