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संतान प्राप्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण व्रत है ‘संतान सप्तमी व्रत’, आइए जानें इसकी सही तिथि और पूजा की विधि
- Written By: नवभारत डेस्क

सीमा कुमारी
नई दिल्ली: पंचांग के अनुसार, हर साल भादो महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को ‘संतान सप्तमी ‘(Santan Saptami) का व्रत रखा जाता है। इस साल ‘संतान सप्तमी व्रत’ 3 सितंबर, शनिवार को रखा जाएगा। हिंदू धर्म में इस दिन व्रत रखने का खास महत्व माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, कहा जाता है कि, इस दिन व्रत रखने व विधि पूर्वक शिव-पार्वति की पूजा करने से निसंतान महिलाओं को संतान सुख का वरदान मिलता है। साथ ही उन्हें महादेव और मां पार्वती के आर्शीवाद से कार्तिकेय और श्रीगणेश जैसी तेजस्वी संतान की प्राप्ति होती है। वहीं जिन महिलाओं को संतान प्राप्त है उन संतानों की आयु लंबी व उन्नति प्राप्त होती है। आइए जानें संतान सप्तमी का शुभ मुहर्त और इसकी कथा,पूजा विधि
शुभ मुहर्त
भाद्रपद शुक्ल सप्तमी आरंभ – 2 सितंबर 2022, 01.51 अपराह्न
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भाद्रपद शुक्ल सप्तमी समाप्त – 3 सितंबर 2022, 12.28 अपराह्न
व्रत-विधि
सप्तमी का व्रत माताएं अपने संतान के लिए करती है। इस व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का विधान है। इस व्रत में अपराह्न तक पूजा-अर्चना करने का विधान है। इस व्रत को करने वाली माता को प्रात:काल में स्नान और नित्यक्रम क्रियाओं से निवृ्त होकर, स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद सुबह भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा अर्चना करनी चाहिए और सप्तमी व्रत का संकल्प लेना चाहिए।
निराहार व्रत कर, दोपहर को चौक पूरकर चंदन, अक्षत, धूप, दीप, नैवेध, सुपारी तथा नारियल आदि से फिर से शिव-पार्वती की पूजा करनी चाहिए। सप्तमी तिथि के व्रत में नैवेद्ध के रुप में खीर-पूरी तथा गुड के पुए बनाये जाते है। संतान की रक्षा की कामना करते हुए भगवान भोलेनाथ को कलावा अर्पित किया जाता है तथा बाद में इसे स्वयं धारण कर व्रत कथा सुननी चाहिए।
कथा
एक बार श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया, किसी समय मथुरा में लोमश ऋषि आए। मेरे माता-पिता देवकी व वसुदेव ने उनकी सेवा की। ऋषि ने कंस द्वारा मारे गए पुत्रों के शोक से उबरने के लिए उन्हें संतान सप्तमी व्रत करने को कहा और व्रत कथा बताई। इसके अनुसार नहुष अयोध्यापुरी का प्रतापी राजा था। पत्नी का नाम चंद्रमुखी था। उसके राज्य में विष्णुदत्त नामक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम रूपवती था। रानी चंद्रमुखी व रूपवती में घनिष्ठ प्रेम था।
एक दिन वे दोनों सरयू में स्नान करने गईं। वहां अन्य स्त्रियां भी स्नान कर रहीं थीं। उन स्त्रियों ने वहीं पार्वती-शिव की प्रतिमा बनाकर विधिपूर्वक पूजन किया। रानी चंद्रमुखी व रूपवती ने उनसे पूजन का नाम व विधि पूछी। उन स्त्रियों में से एक ने बताया- यह व्रत संतान देने वाला है।
उस व्रत की बात सुनकर उन दोनों सखियों ने भी जीवन-पर्यन्त इस व्रत को करने का संकल्प किया और शिवजी के नाम का डोरा बांध लिया। घर पहुंचने पर वे संकल्प भूल गईं। फलत: मृत्यु पश्चात रानी वानरी व ब्राह्मणी मुर्गी की योनि में पैदा हुई। कालांतर में दोनों पशु योनि छोड़कर पुन: मनुष्य योनि में आईं। चंद्रमुखी मथुरा के राजा पृथ्वीनाथ की रानी बनी व रूपवती ने फिर ब्राह्मण के घर जन्म लिया। इस जन्म में रानी ईश्वरी व ब्राह्मणी का नाम भूषणा था। भूषणा का विवाह राजपुरोहित अग्निमुखी के साथ हुआ। इस जन्म में भी दोनों में बड़ा प्रेम हो गया। व्रत भूलने के कारण ही रानी इस जन्म में भी संतान सुख से वंचित रही। भूषणा ने व्रत को याद रखा, इसलिए उसके गर्भ से आठ सुन्दर व स्वस्थ पुत्रों ने जन्म लिया।
रानी ईश्वरी के पुत्र शोक की संवेदना के लिए एक दिन भूषणा उससे मिलने गई। उसे देखते ही रानी के मन में ईष्र्या पैदा हो गई और उसने उसके बच्चों को मारने का प्रयास किया, किन्तु बालक न मर सके। उसने भूषणा को बुलाकर सारी बात बताई और फिर क्षमायाचना करके उससे पूछा- किस कारण तुम्हारे बच्चे नहीं मर पाए। भूषणा ने उसे पूर्वजन्म की बात स्मरण करवाई और उसी के प्रभाव से आप मेरे पुत्रों को चाहकर भी न मरवा सकीं। यह सुनकर रानी ईश्वरी ने भी विधिपूर्वक संतान सुख देने वाला यह मुक्ताभरण व्रत रखा। व्रत के प्रभाव से रानी पुन: गर्भवती हो गई और एक सुंदर बालक को जन्म दिया। उसी समय से पुत्र-प्राप्ति और संतान की रक्षा के लिए यह व्रत प्रचलित है।
The most important fast for getting a child is santan saptami vrat lets know its exact date and method of worship
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