नई दिल्ली: विविधता से भरे इस देश की खूबियों के बारे में जितना कहा जाए कम है। जहां देश के कुछ हिस्सों में पोंगल और मकर संक्रांति मनाई जाते है वही देश के कुछ हिस्सों में बड़े उत्साह के साथ लोहड़ी का त्यौहार भी मनाया जाता हैं। जानकारी के लिए आपको बता दें कि लोहड़ी का त्यौहार देश में फसल के मौसम के आगमन का प्रतीक है।
इस साल 14 जनवरी 2023 को मकर संक्रांति मनाई जा रही है। वहीं लोहड़ी का त्योहार मकर संक्रांति की पूर्व संध्या यानी एक दिन पहले मनाया जाता है। ऐसे में इस साल लोहड़ी का पर्व 13 जनवरी को मनाया जाएगा। बता दें कि 13 जनवरी को लोहड़ी की पूजा का शुभ मुहूर्त रात 8 बजकर 57 मिनट पर है। अब आइए जानते है इस लोहड़ी त्यौहार से जुड़ी कुछ खास बातें…
लोहड़ी की तैरख जब हम देखे तो हमें समझता है कि लोहड़ी सर्दियों के बीतने की याद दिलाता है। साथ ही आपको यह भी बता दें कि एक धारणा है कि लोहड़ी वर्ष की सबसे लंबी रात का प्रतिनिधित्व करती है, और इसके बाद वाले दिन को माघी कहा जाता है। कहा जाता है कि लोहड़ी के समय किसानों के खेत लहलहाने लगते हैं और रबी की फसल कटकर आती है। नई फसल के आने की खुशी और अगली बुवाई की तैयारी से पहले लोहड़ी का जश्न मनाया जाता है।
बता दें कि लोहड़ी में रबी फसलों की कटाई मनाई जाती है, जिन्हें सर्दियों में बोया जाता है। इन फसलों में सरसों (सरसों के पत्ते), तिल, गेहूं और पालक जैसे शीतकालीन खाद्य पदार्थ त्योहार का एक अभिन्न अंग हैं। उत्सव के हिस्से के रूप में, रात का खाना अलाव की रस्म के बाद परोसा जाता है। इस तरह यह लोहड़ी का योहार बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।
दरअसल तिल (तिल) और रोरी (गुड़) को पारंपरिक उत्सव के रूप में खाया जाता है। तिल और रोरी शब्द एक साथ मिलकर ‘तीलोरी’ बनाते हैं, जो अंततः लोहड़ी में फिर से जुड़ गया। बोनफायर लोहड़ी उत्सवों और लोगों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, साथ ही परिवार और दोस्तों के साथ ‘सुंदरी मुंडारिये हो’ जैसे प्रसिद्ध त्योहार के गीतों की धुन पर नृत्य करते हैं। रेवाड़ी, गजक और मूंगफली के साथ लोग इन लोकप्रिय ‘लोहड़ी’ वस्तुओं का आनंद लेते हैं। पंजाब व हरियाणा समेत उत्तर भारत के कई बड़े क्षेत्रों में लोहड़ी का त्योहार बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है।