

Early Puberty in Girls: मानव शरीर की मेकेनिज्म एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें हार्मोन एक केमिकल मैसेंजर की तह काम करता है। हालांकि यह बहुत कम मात्रा में बनते हैं, लेकिन हमारे शरीर में खून के जरिए शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंचकर लगभग हर शारीरिक गतिविधि को नियंत्रित करते हैं।
इन हार्मोन की शक्ति जितनी अधिक होती है, उतनी ही संवेदनशील भी होती है। हार्मोन के स्तर में बहुत छोटा-सा बदलाव भी हार्मोनल असंतुलन का कारण बन सकता है, जिसका असर शारीरिक विकास से लेकर मेंटल और इमोशनल हेल्थ तक पर पड़ता है।
एंडोक्राइन सिस्टम की कार्यप्रणाली और आधुनिक समय में हार्मोन से संबंधित समस्याएं तेजी से बढ़ रही है, आइए जानते हैं इसके कारण और इससे बचने के उपाय।
जन्म से लेकर वयस्क होने तक हार्मोन हमारे शरीर के विकास का मार्गदर्शन करते हैं। बचपन, टीनएज और फर्टिलिटी की उम्र तक शरीर में हार्मोनल बदलाव होते हैं, जिनकी भूमिका हर चरण में अलग-अलग होते हैं।
इस दौरान हार्मोन शारीरिक वृद्धि और मस्तिष्क के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
हार्मोन ही प्यूबर्टी की शुरुआत करते हैं और बच्चों को वयस्कता की ओर ले जाते हैं।
इस उम्र में हार्मोन केवल प्रजनन क्षमता ही नहीं, बल्कि हड्डियों की मजबूती, मांसपेशियों के विकास और त्वचा व बालों के स्वास्थ्य को भी बनाए रखते हैं।
आज की बदलती जीवनशैली के कारण हार्मोनल समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। एंडोक्राइन विशेषज्ञों के अनुसार, अब लड़कियों में पहले की तुलना में बहुत कम उम्र में यौवन की शुरुआत हो रही है। आज 8 साल की उम्र में ही कई लड़कियों में स्तन का विकास और पीरियड्स शुरू होने लगे हैं। दूसरी ओर, कुछ बच्चों में यौवन देर से आने की समस्या भी देखी जा रही है। इन दोनों स्थितियों के पीछे कई कारण हो सकते हैं।
अब हार्मोन असंतुलन केवल मध्यम आयु की समस्या नहीं रह गया है। यह किसी भी उम्र में हो सकता है। प्रजनन हार्मोन के अलावा इंसुलिन, जो ब्लड शुगर को नियंत्रित करता है और स्ट्रेस हार्मोन- कॉर्टिसोल, में भी कम उम्र में असंतुलन देखा जा रहा है।
पीरियड्स किसी महिला का स्वास्थ्य संबंधी रिपोर्ट कार्ड होता है, जो प्रत्येक माह बताता है कि महिला का इंटरनल सिस्टम कैसे फंक्शन कर रहा है। किशोरियों और 20-30 वर्ष की महिलाओं में पीसीओएस और दर्दनाक पीरियड्स की समस्या तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका बड़ा कारण खराब जीवनशैली है।
पहले 40 साल से अधिक उम्र के लोगों में टाइप-2 डायबिटीज के मामले पाए जाते थे, लेकिन अब यह 15 साल के बच्चों में भी देखने को मिल रही है। इसके पीछे मोटापा और जेनेटिक कारण हो सकते हैं।
आजकल छोटे बच्चों में भी थायरॉयड संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं, जिससे उनकी ऊर्जा, शारीरिक विकास और वृद्धि प्रभावित हो सकती है।
चूंकि हार्मोन शरीर के कई अंगों को प्रभावित करते हैं, इसलिए इसके लक्षण भी अलग-अलग हो सकते हैं। यदि आपको नीचे दिए गए लक्षण दिखाई दें, तो एंडोक्राइन विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।