जानिए ठंडाई का इतिहास (सौ.सोशल मीडिया)
History of Thandai: रंग-बिरंगे रंगों वाला त्योहार यानि होली आने में कुछ दिन ही शेष बचे है जिसके लिए सभी ने बड़ी तैयारियां शुरू कर दी है। होली के त्योहार में रंग और गुलाल के अलावा ठंडी-ठंडी ठंडाई भी होती है जिसके बिना पूरा त्योहार अधूरा हो जाता है। हिंदू धर्म में किसी भी त्योहार को धूमधाम से मनाया जाता है। ठंडाई के अलावा गुजिया का भी भोग लगता है जिसे विशेष रूप से बनाया जाता है। ऐसे में अधिकतर घरों होली पर ठंडाई जरूर बनाई जाती है। कुछ जगहों पर भांग की ठंडाई का भी प्रचलन है। यहां पर ठंडाई की शुरुआत कैसे हुई और इसका ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व क्या है चलिए जानते है…
यहां पर ठंडाई की बात की जाए तो, यह दूध, बादाम, सौंफ, काली मिर्च, इलायची और केसर जैसी ठंडी तासीर वाली सामग्रियों से बनी यह पारंपरिक ड्रिंक है। यह स्वाद को बढ़ाने के साथ ही शरीर को ठंडक देने का काम भी करती है। ठंडाई बनाने के पीछे कई कारण है जो आपको जानना जरूरी है।
आपको बताते चलें कि, भगवान शिव के समय से ठंडाई का प्रचलन काफी रहा है जहां पर इससे जुड़ी कहानी प्रचलित है।एक कथा के अनुसार महाशिवरात्रि पर भगवान शिव माता पार्वती से ब्याह करने के बाद वैराग्य जीवन को त्यागकर गृहस्थ जीवन की ओर अग्रसर हुए थे। ऐसे में इस जश्न की खुशी में भांग की ठंडाई का वितरण हुआ था। तभी से ठंडाई पीने का रिवाज है। दूसरी मान्यतानुसार भगवान शिव और विष्णु के बीच गहरी दोस्ती थी और होली पर हिरण्यकश्यप के संहार करने के लिए विष्णु भगवान ने नरसिंह अवतार धारण किया था। ऐसे में संहार के बाद विष्णु भगवान काफी क्रोध में आ गए थे। ऐसे में उनके इस क्रोध को शांत करने के लिए शिव जी ने शरभ अवतार लिया था। उसके बाद से भी होली पर ठंडाई का चलन शुरू हुआ।
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आपको बताते चलें कि, ठंडाई का इतिहास पुराना है तो वहीं पर इसका सेवन करने से शरीर को एनर्जी मिलती है और पाचन में भी मदद करने का काम करता है। यहां पर ठंडाई का इतिहास काफी पुराना है जिसमें ठंडाई का संबंध 1000 ईसा पूर्व से बताया जाता है। बताया जाता है ठंडाई मुगल काल में भी राजाओं और नवाबों के दरबार में भी मेहमानों के सामने परोसी जाती थी। इसका सेवन करने से कई गंभीर बीमारियों का खतरा टलता है तो वहीं पर इसका सेवन करने से शरीर की इम्यूनिटी भी बेस्ट होती है।