वामन जयंती 4 सितंबर को, जानिए जगत के पालनहार भगवान विष्णु को क्यों लेना पड़ा यह अवतार
Vaman Dwadashiभगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करने से समस्त बुरे कर्मों का नाश होता है और पुण्य फल में वृद्धि होती है। आइए जानते हैं आखिर भगवान विष्णु को यह अवतार क्यों लेना पड़ा?
- Written By: सीमा कुमारी
वामन जयंती
Vaman Dwadashi 2025:4 सितंबर 2025 को वामन जयंती मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार, हर साल भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष की 12वीं तिथि को वामन जयंती का पर्व मनाया जाता है। इसे वामन द्वादशी के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इसी तिथि में भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया था। यह भगवान विष्णु का पांचवा अवतार है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करने से समस्त बुरे कर्मों का नाश होता है और पुण्य फल में वृद्धि होती है।भगवान विष्णु ने धर्म और सृष्टि की रक्षा के लिए कई अवतार लिए, जिसमें वामन अवतार भी एक है। आइए जानते हैं आखिर भगवान विष्णु को यह अवतार क्यों लेना पड़ा?
कब मनाई जाएगी वामन जयंती
तिथि- गुरुवार, 4 सितंबर 2025
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द्वादशी तिथि प्रारंभ- 4 सितंबर, सुबह 4 बजकर 20 मिनट से
द्वादशी तिथि समाप्त- 5 सितंबर, सुबह 4 बजकर 10 मिनट तक
भगवान विष्णु को क्यों लेना पड़ा वामन अवतार
वामन द्वादशी पूजा विधि
वामन द्वादशी के दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा की जाती है। इस दिन प्रातःकाल वामन देव की प्रतिमा की षोडशोपचार पूजा की जाती है। कई लोग इस दिन व्रत रखते है। शाम की पूजा में वामन द्वादशी की व्रत कथा पढ़ी या सुनी जाती है। इसके बाद व्रती प्रसाद ग्रहण कर अपना व्रत खोल लेते हैं। इस दिन चावल, दही और मिश्री का दान करना बेहद शुभ माना जाता है।
क्या है वामन द्वादशी व्रत कथा जानिए
किसी समय की बात है कि अत्यन्त बलशाली दैत्य राजा बलि ने इन्द्र देव को पराजित कर स्वर्ग पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। भगवान विष्णु के परम भक्त और दानवीर राजा होने के बावजूद भी बलि एक क्रूर और अभिमानी राक्षस था। वो अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर देवताओं को डराया करता था। अजेय बलि अपने बल से स्वर्ग लोक, भू लोक तथा पाताल लोक का स्वामी बन बैठा था।
जब स्वर्ग पर बलि ने अपना अधिकार जमा लिया तब इन्द्र देव अन्य देवताओं के साथ भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे और उनसें सहायता की विनती की। इसके बाद भगवान विष्णु ने सभी को बलि के अत्याचारों से मुक्ति दिलवाने के लिए माता अदिति के गर्भ से वामन अवतार के रूप में जन्म लिया।
भगवान विष्णु वामन रूप में सभा में पहुंचे जहां राजा बलि अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे। वामन देव ने भिक्षा के रूप में बलि से तीन पग धरती मांगी। बलि एक दानवीर राजा थे, सहर्ष रूप से उन्होंने वामन देव की इच्छा पूरी करने का वचन दिया। तत्पश्चात, वामन देव ने अत्यन्त विशाल रूप धारण किया और पहले पग से ही उन्होंने समस्त भू लोक को नाप लिया। दूसरे पग से उन्होंने स्वर्ग लोक नाप लिया।
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इसके बाद जब वामन देव अपना तीसरा पग उठाने को हुये तब राजा बलि को यह ज्ञात हुआ की यह स्वयं भगवान विष्णु हैं। अतः बलि ने तीसरे पग के लिये अपना शीर्ष वामन देव के सामने प्रस्तुत कर दिया। तब भगवान विष्णु ने बलि की उदारता का सम्मान करते हुये उसे पाताल लोक दे दिया। भगवान विष्णु ने साथ ही बलि को यह भी वरदान भी दिया कि वह साल में एक बार अपनी प्रजा के समक्ष धरती पर उपस्थित हो सकता है। राजा बलि की धरती पर वार्षिक यात्रा को केरल में ओणम और अन्य भारतीय राज्यों में बलि-प्रतिपदा के रूप में मनाया जाता है।
