दीन दयाल उपाध्याय (सोर्स- सोशल मीडिया)
Deen Dayal Upadhyaya Death Anniversary: 10 फरवरी 1968 की रात भारतीय राजनीति के इतिहास में एक ऐसी तारीख बन गई, जिसने आज तक अनगिनत सवाल छोड़े हैं। भारतीय जनसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष और प्रखर चिंतक दीनदयाल उपाध्याय उस रात लखनऊ से पटना जाने के लिए सियालदह एक्सप्रेस में सवार हुए थे। आधी रात के आसपास उन्हें जौनपुर स्टेशन पर अंतिम बार जीवित देखा गया। इसके बाद वे रहस्यमय ढंग से लापता हो गए।
जब ट्रेन सुबह 2:10 बजे मुगलसराय स्टेशन पहुंची जिसे आज दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन कहा जाता है तो उपाध्याय ट्रेन में नहीं थे। कुछ ही समय बाद उनका शव रेलवे ट्रैक के पास एक ट्रैक्शन पोल के नजदीक मिला। उनके हाथ में पांच रुपये का नोट था। इस घटना ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। उनकी मृत्यु के हालात आज भी स्पष्ट नहीं हैं।
मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच का जिम्मा केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपा गया। CBI की जांच में यह निष्कर्ष सामने आया कि लूटपाट की कोशिश के दौरान कुछ छोटे चोरों ने उन्हें चलती ट्रेन से धक्का दे दिया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। इस सिलसिले में भरत लाल और राम अवध नामक दो व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया।
हालांकि, पर्याप्त सबूतों के अभाव में अदालत ने दोनों आरोपियों को बरी कर दिया। इस फैसले ने संदेह को और गहरा कर दिया। राजनीतिक गलियारों और आम जनता के बीच यह धारणा बनी कि सच्चाई पूरी तरह सामने नहीं लाई गई।
जनदबाव और 70 से अधिक सांसदों की मांग के बाद सरकार ने जस्टिस वाई.वी. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में एक न्यायिक आयोग का गठन किया। आयोग की रिपोर्ट भी मोटे तौर पर CBI के निष्कर्षों से मेल खाती थी और मौत को एक आकस्मिक आपराधिक घटना बताया गया। इसके बावजूद, राजनीतिक साज़िश की आशंकाएँ कभी पूरी तरह खत्म नहीं हो सकीं।
25 सितंबर 1916 को मथुरा जिले के नागला चंद्रभान गांव में जन्मे दीनदयाल उपाध्याय केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि गहरे वैचारिक दृष्टिकोण वाले चिंतक थे। उन्हें ‘एकात्म मानवतावाद’ के प्रणेता के रूप में जाना जाता है।
यह दर्शन व्यक्ति और समाज के समग्र विकास पर आधारित है, जिसमें भौतिक प्रगति और आध्यात्मिक मूल्यों के बीच संतुलन को अनिवार्य माना गया है। यह विचारधारा भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं में रची-बसी है और पश्चिमी विकास मॉडलों का भारतीय विकल्प प्रस्तुत करती है।
दीनदयाल उपाध्याय का सार्वजनिक जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ने के साथ शुरू हुआ, जहां उन्होंने एक कुशल संगठनकर्ता और वैचारिक मार्गदर्शक के रूप में पहचान बनाई। 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ मिलकर उन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनके नेतृत्व में जनसंघ ने आत्मनिर्भरता, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और ग्रामीण भारत के उत्थान को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया। वे ऐसे विकास मॉडल के समर्थक थे जो आधुनिकता को अपनाते हुए भी भारतीय परंपराओं से कटे नहीं।
दीनदयाल उपाध्याय का निधन भले ही असमय हुआ हो, लेकिन उनके विचार आज भी भारतीय राजनीति और नीति-निर्माण में जीवित हैं। उनके नाम पर शुरू की गई दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्या योजना और दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना जैसी पहलें ग्रामीण सशक्तिकरण और आधारभूत विकास पर उनके ज़ोर को दर्शाती हैं।
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आज, उनके निधन के 58 वर्ष बाद भी, उनकी मृत्यु से जुड़े प्रश्न अनुत्तरित हैं। फिर भी, भारत के लिए उनका सपना एक आत्मनिर्भर, सांस्कृतिक रूप से सशक्त और समावेशी राष्ट्र आज भी विचार और नीति दोनों स्तरों पर मार्गदर्शन करता है।