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‘दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे..आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे’

  • Written By: रवि शुक्ला
Updated On: Feb 27, 2022 | 06:01 AM
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चंद्रशेखर आज़ाद भारतीय स्वतंत्र संग्राम का वो महत्वपूर्ण सेनानी थे, जिन्होंने भारतीयों युवाओं के मन में आज़ादी के लिए अलख जगाने का काम किया। उनको आदर्श मानकर भगत सिंह जैसे कई युवा आजादी की लड़ाई में खुद गए थे और अपने जान को मातृभूमि के लिए नौछावर कर दिया। आजाद का सम्मान जितना हिंदुस्तानी करते हैं, उतना ही ब्रिटेन के लोग करते हैं। आज भी इंग्लैंड में आजाद का नाम बेहद सम्मान के साथ ले ते हैं।

आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भावरा गांव में पंडित सीताराम तिवारी और जागरानी देवी के परिवार में चंद्रशेखर तिवारी के रूप में हुआ था। आजाद की मां ने उनके पिता से अपने बेटे को वाराणसी के काशी विद्यापीठ भेजने के लिए कहा। 1919 में अमृतसर के जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार से वह बहुत प्रभावित हुए थे। वह 1921 में स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए थे, जब वे सिर्फ एक स्कूली छात्र थे।

कैसे पड़ा आजाद नाम

दिसंबर 1921 में, जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया, तो आजाद ने इसमें भाग लिया। आंदोलन में शामिल होने के बाद, उन्हें ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और जब उन्हें एक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, तो उन्होंने अपना नाम ‘आजाद’, अपने पिता का नाम ‘स्वतंत्र’ और अपने निवास को ‘जेल’ घोषित किया। तभी से उनके नाम के साथ ‘आज़ाद’ की उपाधि जोड़ा जाने लगा।

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चौरी चौरा के बाद गांधी से हुआ मोह भंग

फरवरी 1922 में चौरी चौरा में पुलिस ने प्रदर्शनकारी किसानों पर गोलियां बरसाई थीं। जवाब में थाने पर हमला करके 22 पुलिसवालों को जिंदा जला दिया गया था। महात्‍मा गांधी ने कांग्रेस के किसी सदस्‍य से बातचीत किए बिना खुद ही आंदोलन समाप्‍त करने की घोषणा कर दी। उसी साल गया कांग्रेस में राम प्रसाद बिस्‍म‍िल ने गांधी के इस कदम का खुलकर विरोध किया था। बिस्मिल इस कदर खफा थे कि कांग्रेस से अलग होकर उन्‍होंने हिंदुस्‍तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) नाम से एक क्रांतिकारी संगठन/पार्टी बना ली। उधर, आंदोलन खत्‍म होने के बाद चंद्रशेखर आजाद का रुख और आक्रामक हो गया। उन्‍हीं की उम्र के मन्मथनाथ गुप्त ने आजाद की मुलाकात बिस्मिल से कराई। भारत को आजादी दिलाने के बिस्‍म‍िल और आजाद के रास्‍ते एक थे। जिसके आबाद आजाद रामप्रसाद बिस्मिल द्वारा गठित एक क्रांतिकारी संगठन हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) में शामिल हो गए। 

HRA के इकलौते ऐसे बड़े नेता  जो गिरफ्तारी से बचने में कामयाब रहे 

आजाद 9 अगस्त, 1925 को ब्रिटिश राज के खिलाफ काकोरी ट्रेन डकैती में शामिल थे। काकोरी की घटना के लिए बिस्मिल, अशफाकुल्लाह खां, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी को फांसी की सजा दी गई थी। आजाद HRA के इकलौते ऐसे बड़े नेता थे जो गिरफ्तारी से बचने में कामयाब रहे थे। इसके बाद आजाद ने भगत सिंह के साथ मिलकर भारत के क्रांतिकारी स्‍वतंत्रता संग्राम में सुनहरे पन्‍ने जोड़े। HRA का नाम बदलकर हिंदुस्‍तान सोशलिस्‍ट रिपब्लिकन एसोसिएशन कर दिया गया।

लड़की की इज्जत बचाने साथी को मारी गोली 

आजाद ने संगठन चलाने के लिए डकैती शुरू की थी। इसी को लेकर उन्होंने एक जमींदार के घर डाली गई। क्रांतिकारियों ने घर में घुसकर लूटपाट शुरू की। इस बीच दल के एक साथी की नजर वहां मौजूद एक नौजवान लड़की पर पड़ी। वासना में अंधे होकर उसने उस युवती से अभद्रता शुरू कर दी। चंद्रशेखर आजाद ने यह देखा तो उसे चेतावनी दी कि ऐसा न करे लेकिन उसने आजाद की बात नहीं मानी। चंद्रशेखर आजाद अपने सिद्धांतों के पक्‍के थे। उनके सामने किसी महिला की इज्‍जत से खिलवाड़ हो, वह बिल्‍कुल बर्दाश्‍त नहीं कर सकते थे। गुस्‍से में उनका चेहरा लाल हो उठा और उन्‍होंने अपने उस साथी पर गोली चला दी। फिर उन्‍होंने उस युवती से इस अभद्रता की माफी मांगी और उस जगह से कुछ लिए बिना ही लौट गए। 

 

अंगेजो से बचने खुद को मारी गोली

आजाद ने 27 फरवरी, 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में ब्रिटिश पुलिस के साथ आमने-सामने की लड़ाई में अपनी जान गंवा दी। केवल एक पिस्तौल और कुछ कारतूसों के साथ कुछ समय तक पुलिस से अकेले लड़ने के बाद, आजाद ने खुद को सिर में गोली मार ली। आजाद ने प्रतिज्ञा की थी वह जिंदा कभी नहीं जायेंगे। इलाहाबाद संग्रहालय में चंद्रशेखर आजाद की कोल्ट पिस्टल प्रदर्शित है।

 

We will face the enemys bullets have been free will remain free chandrashekhar azad biography

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Published On: Feb 27, 2022 | 06:01 AM

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