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Explainer: VB-G RAM G देश में लागू, बीजेपी शासित राज्य ही क्यों कर रहे विरोध; सरकारों के सामने ये कैसी चुनौती?
- Written By: मनोज आर्या
VB-G RAM G Fund Challenges: केंद्र सरकार ने वीबी-जी राम जी एक्ट को पूरे देश में लागू कर दिया है। हालांकि, कई राज्यों ने न तो इस योजना को नोटिफाई किया है और न ही इसके लिए बजट दिया है। आखिर क्यों?

वीबी-जी राम जी की जमीनी हकीकत, (AI जेनरेटेड इमेज)
Why VB-G RAM G Challegnging For State Government: दो दशक पुराने मनरेगा की जगह अब VB-G RAM G एक्ट बुधवार को लागू हो गया। हालांकि, कई राज्यों ने न तो इस नई ग्रामीण रोजगार योजना को नोटिफाई किया है और न ही इसके लिए बजट दिया है। बीजेपी शासित मध्य प्रदेश और उत्तराखंड समेत पांच राज्यों ने नए कानून के तहत राज्यों पर बढ़े हुए फंड के बोझ का विरोध किया है, जो हर ग्रामीण परिवार को साल में 125 दिन काम देने का प्रावधान करता है। विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) ने दो दशक पुराने महात्मा गांधी नेशनल रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट (MGNREGA) की जगह ले ली है, जिसमें हर परिवार को 100 दिन का काम मिलता था।
मनरेगा के तहत, ग्रामीण विकास मंत्रालय (MoRD) पूरी मजदूरी का खर्च उठाता था, जबकि मेटेरियल का खर्च केंद्र और राज्यों के बीच 75:25 के अनुपात में बांटा जाता था। मनरेगा के तहत राज्यों का कुल हिस्सा कुल खर्च का 10 प्रतिशत से कम रहा। हालांकि, नए कानून के तहत, राज्यों को कुल खर्च का 40 प्रतिशत उठाना होगा।
24 राज्यों में नोटिफिकेशन जारी
राइट-टू इन्फॉर्मेशन (RTI) एक्ट के तहत नेशनल कैंपेन फॉर पीपल्स राइट टू इन्फॉर्मेशन के चक्रधर बुद्धा से मिले डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड और तेलंगाना के प्रतिनिधियों ने अप्रैल में केंद्र के साथ एक मीटिंग में बढ़े हुए फंड के बोझ का विरोध किया था। मंगलवार को ग्रामीण विकास मंत्रालय की तरफ से जारी एक मीडिया रिलीज के मुताबिक, 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने VB-G RAM G के लिए बजट में प्रावधान किया है, जबकि 24 राज्यों ने इस स्कीम को अधिसूचित कर दिया है।
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ग्राणीण विकास मंत्रालय के नोटिफिकेशन के मुताबिक, 2026-27 के लिए हर दिन की मजदूरी की दरें 300 रुपये (बंगाल, बिहार, जम्मू और कश्मीर और 19 दूसरे राज्यों में) और 409 रुपये (हरियाणा में) के बीच हैं।

हालांकि, नई मजदूरी की दरें 2025-26 की मनरेगा दरों से ज्यादा हैं, फिर भी वे कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की अप्रैल की मीटिंग में की गई मांग से कम हैं। अधिकारिक डॉक्यूमेंट के मुताबिक, बिहार ने मजूदूरी 255 रुपये से बढ़ाकर 413 रुपये करने की मांग की थी, जबकि जम्मू और कश्मीर ने 272 रुपये से बढ़ाकर 311 रुपये करने की मांग की थी। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने मई में VB-G RAM G पर ड्राफ्ट नियमों को नोटिफाई किया था। उन्हें अभी फाइनल किया जाना बाकी है।
कई राज्यों के पास अतिरिक्त फंड नहीं
चक्रधर बुद्धा के हवाले से द टेलीग्राफ की रिपोर्ट में कहा गया है कि कई राज्यों में नोटिफिकेशन, नियमों और तय बजट की कमी की वजह से नई स्कीम को लागू करने में जमीनी स्तर पर वास्तविक मुश्किलें आएंगी। कानून कहता है कि केंद्र राज्यों के लिए नॉर्मल एलोकेशन तय करेगा और हर राज्य उस रकम का 40 प्रतिशत उठाएगा। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने पिछले महीने ही राज्यों के लिए नॉर्मल एलोकेशन तय किया था। इसीलिए कर्नाटक समेत कई राज्यों ने अपने बजट में VB-G RAM G के लिए फंड तय नहीं किया है। इसलिए जॉब स्कीम को लागू करने में गड़बड़ी होगी।
नियम कानून के नियमों को साफ करते हैं और इसे लागू करने में मदद करते हैं। चूंकि ग्रामिण विकास मंत्रालय और कई राज्यों ने अपने नियमों को नोटिफाई नहीं किया है, इसलिए स्कीम के तहत नौकरी ढूंढने वाले वर्कर्स को अनिश्चितता का सामना करना पड़ेगा।
ग्रामीण परिवारों 125 दिन काम कैसे?
सोशल एक्टिविस्ट निखिल डे ने कहा कि नई स्कीम के तहत जॉब गारंटी केवल कागजों पर अच्छी लग रही है। उन्होंने कहा कि राज्यों के सामने पैसे की दिक्कतों को देखते हुए, उन पर 40 प्रतिशत फंड का अतिरिक्त बोझ बहुत ज्यादा है। केंद्र ने 95,000 करोड़ रुपये दिए हैं, जो लगभग मनरेगा के तहत तय किए गए पैसे के बराबर है। जब पात्रता 100 दिन की थी, तब मनरेगा के तहत परिवारों को लगभग 50 दिन काम मिल रहा था। अब परिवारों को 125 दिन काम कैसे मिलेगा?
नए कानून के तहत राज्यों को अपने तय नॉर्मेटिव बजट से ज्यादा खर्च भी उठाना होगा। निखिल डे 125 दिन रोजगार की गारंटी कोई गारंटी नहीं है क्योंकि इसके लिए जरूरी फंड का इंतजाम नहीं है। उन्होंने कहा कि कई राज्यों में नई मजदूरी की दरें मिनिमम मजदूरी की दरों से कम थीं। किसी भी स्कीम के तहत मजदूरी मिनिमम मजदूरी से कम नहीं होनी चाहिए। लेकिन यह कई राज्यों में मिनिमम मजदूरी से कम है। यह मजदूरों के लिए मिनिमम स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग (न्यूनतम जीवन स्तर) से इनकार है।
कांग्रेस नेता ने कानून का किया विरोध
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट किया कि मजदूरी गलत तरीके से कम थी। उन्होंने 2018 में अनूप सत्पथी की अगुवाई वाली एक एक्सपर्ट कमिटी की सिफारिश का जिक्र किया कि जुलाई 2018 के प्राइस इंडेक्स पर नेशनल मिनिमम वेज फ्लोर 375 रुपये प्रति दिन होना चाहिए। कांग्रेस नेता ने अपने पोस्ट में आगे लिखा कि नोएडा जैसे इंडस्ट्रियल हब में मिनिमम वेज को लेकर बड़े पैमाने पर हो रहे विरोध को देखते हुए, और ऐसे समय में जब ग्रामीण इलाकों में वेतन में ठहराव को हमारी आर्थिक ग्रोथ में एक बड़ी रुकावट के तौर पर पहचाना जा रहा है, यह कानून भारत के मजदूरों के लिए एक अपमान और एक नासमझी भरी आर्थिक पॉलिसी है।

यह भी पढ़ें: Explainer: दो दशक बाद मनरेगा का अंत, अब नए कलेवर में VB-G RAM G की शुरुआत; नए कानून में क्या-क्या खास?
ग्रामीण मजदूरों के सामने चुनौतियां
नरेगा संघर्ष मोर्चा के बैनर तले कई मजदूर संगठनों ने बुधवार को राज्यों पर बढ़ते बोझ, कम फंड एलोकेशन और कम वेतन दरों की चिंताओं को लेकर VB-G RAM G के रोलआउट का विरोध किया। हालांकि, ग्रामीण मजदूरों के मन में एक ही सवाल है कि अगर राज्य सरकारें रोजगार के नए कानून को सही तरीके से जमीनी स्तर पर लागू नहीं करती हैं, तो उन्हें काम कैसे मिलेगा। वहीं, न्यूनतम दिहाड़ी भी एक चिंता का विषय है। जहां आमतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में यह 400 से 500 रुपये के बीच है। जबकि योजना में कुछ राज्यों के लिए यह सिर्फ 300 तय किया गया है।
Vb g ram g implemented why bjp ruling states opposing new law explainer
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