वंदे मातरम की अनिवार्यता का विरोध जताते लोग। इमेज-प्रतीकात्मक, एआई
Muslim Personal Law Board On Vande Mataram : केंद्र सरकार की ओर से राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम को लेकर जारी नए प्रोटोकॉल ने बड़ा संवैधानिक और धार्मिक विवाद खड़ा कर दिया है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने आधिकारिक समारोहों में वंदे मातरम के सभी छह छंदों को अनिवार्य रूप से गाने के आदेश को असंवैधानिक बताते हुए केंद्र सरकार को इसे तुरंत वापस लेने की चेतावनी दी है।
बोर्ड ने दो टूक कहा कि आदेश वापस नहीं लिया गया तो वे कानूनी लड़ाई के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे। गौरतलब है कि गृह मंत्रालय द्वारा 28 जनवरी को जारी निर्देश में राष्ट्रीय समारोहों के लिए एक नया प्रोटोकॉल तय किया गया है।
नए नियमों के अनुसार राष्ट्रपति के आगमन, ध्वजारोहण और राज्यपालों के भाषण जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में राष्ट्रगान से पहले वंदे मातरम के सभी छह छंद गाए जाएंगे। इन छह छंदों के गायन की कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकंड निर्धारित की गई है। अब तक आधिकारिक तौर पर इस गीत के केवल पहले दो छंदों को गाने की परंपरा रही है।
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना मोहम्मद फजलुर रहीम मुजद्दिदी ने इस निर्णय पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बताया है। बोर्ड के ये मुख्य तर्क हैं-
ऐतिहासिक मर्यादा : बोर्ड का कहना है कि संविधान सभा की बहसों और रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह के बाद ही यह सहमति बनी थी कि वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो छंद ही गाए जाएंगे।
धार्मिक मान्यता : इस्लाम के अनुसार अनुयायी केवल एक ईश्वर (अल्लाह) की इबादत कर सकते हैं। गीत के बाद के छंदों में दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की वंदना का उल्लेख है, जो मुस्लिम समुदाय की धार्मिक मान्यताओं के विपरीत है।
धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन : बोर्ड ने तर्क दिया कि एक धर्मनिरपेक्ष सरकार किसी विशेष धर्म से जुड़ी मान्यताओं या गीतों को दूसरे धर्म के लोगों पर जबरन नहीं थोप सकती।
مرکزی حکومت کے ”وندے ماترم“ تمام اشعار کو اسکول و سرکاری تقریبات میں لازمی قرار دینے کا نوٹیفیکیشن غیر آئینی، مذہبی آزادی و سیکولر اقدار کے منافی اور عدالت عظمیٰ کے فیصلے کے خلاف ہے۔ اس میں درگا اور دیگر دیویوں اور دیوتاؤں کی پوجا اور وندنا کی بات کہی گئی ہے۔ جو مسلمانوں کے عقیدے… pic.twitter.com/5dmaoUXD8G — All India Muslim Personal Law Board (@AIMPLB_Official) February 12, 2026
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मौलाना मुजद्दिदी ने पूर्व के अदालती फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय अदालतों ने भी अन्य छंदों को धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के विपरीत माना है। बोर्ड ने केंद्र सरकार से मांग की है कि देश की विविधता और संवैधानिक मर्यादा को देखते हुए इस अधिसूचना को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए। फिलहाल इस मुद्दे ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार अपने रुख पर कायम रहती है या इस विरोध के बाद प्रोटोकॉल में कोई बदलाव किया जाता है।