उदयनिधि स्टालिन, फोटो- सोशल मीडिया
Udhayanidhi Stalin Hindi remark: तमिलनाडु के उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने एक बार फिर हिंदी थोपने के मुद्दे पर विवादित बयान दिया है। उन्होंने दावा किया कि हिंदी संपर्क में आने वाली अन्य मातृभाषाओं को ‘निगल’ जाती है और उनकी भाषाई पहचान खत्म कर देती है, जिससे कई राज्यों की स्थानीय भाषाएं अस्तित्वविहीन हो गई हैं।
तमिलनाडु के उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने चेन्नई में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान हिंदी भाषा को लेकर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि हिंदी एक ऐसी भाषा है जो अन्य राज्यों की मातृभाषाओं को ‘निगल’ जाती है और उनकी विशिष्ट पहचान को पूरी तरह मिटा देती है। स्टालिन के अनुसार, हिंदी के बढ़ते प्रभाव के कारण देश के कई राज्यों में उनकी अपनी स्थानीय भाषाएं अब महत्वहीन या पूरी तरह गैर-मौजूद हो गई हैं। उन्होंने इसे एक “चिंताजनक पैटर्न” बताया जो भाषाई विविधता के लिए घातक है।
अपने संबोधन में उदयनिधि स्टालिन ने उत्तर भारत के कई राज्यों का उदाहरण देते हुए दावा किया कि वहां के लोग हिंदी के प्रभाव के कारण अपनी असली भाषाई पहचान खो चुके हैं। उन्होंने कहा कि हरियाणा की अपनी एक समृद्ध मातृभाषा थी, लेकिन हिंदी के अत्यधिक उपयोग के कारण वहां के लोग अपनी भाषा की कला और मौलिकता खो बैठे हैं।
इसी तरह, उन्होंने बिहार का जिक्र करते हुए कहा कि वहां की असली मातृभाषा ‘बिहारी’ है, लेकिन हिंदी के आने से बिहार की अपनी स्वतंत्र पहचान धूमिल हो गई है। उन्होंने उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी यही स्थिति होने का दावा किया और कहा कि इन जगहों पर स्थानीय बोलियां अब हाशिए पर चली गई हैं। स्टालिन का तर्क है कि तमिलनाडु कभी भी अपनी भाषा के साथ ऐसा नहीं होने देगा।
उपमुख्यमंत्री ने अपने भाषण में फिल्म ‘पराशक्ति’ के एक प्रसिद्ध संवाद ‘थी परवट्टुम’ का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि सेंसर बोर्ड (CBFC) ने इस साधारण से संवाद पर आपत्ति जताते हुए कट लगा दिया था। स्टालिन ने तंज कसते हुए कहा कि केंद्र में बैठे लोग इतने असुरक्षित महसूस करते हैं कि उन्हें ‘लेट द फायर रेज ऑन’ जैसे सरल डायलॉग से भी असुरक्षा और घबराहट होने लगती है। उन्होंने इस सेंसरशिप को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और क्षेत्रीय गौरव को दबाने का एक जरिया बताया।
उदयनिधि स्टालिन ने स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के नेतृत्व में राज्य सरकार हिंदी थोपने के किसी भी प्रयास का कड़ा विरोध जारी रखेगी। उन्होंने इसे पेरियार, अन्नादुरै और कलाइग्नार करुणानिधि की विरासत बताया और कहा कि वे उन्हीं के पदचिह्नों पर चल रहे हैं। उन्होंने याद दिलाया कि यह विरोध वह चिंगारी है जो पेरियार ने जलाई थी और जिसे आज एमके स्टालिन और तेज कर रहे हैं।
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केंद्र की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) पर निशाना साधते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि यदि तमिलनाडु पर हिंदी थोपने की कोशिश की गई, तो राज्य में एक और ‘भाषा युद्ध’ छिड़ सकता है। उन्होंने कहा कि जिन राज्यों ने हिंदी को अपनाया है, उन्होंने अपनी मूल मातृभाषा को खो दिया है, लेकिन तमिलनाडु अपनी तमिल पहचान को सुरक्षित रखने के लिए प्रतिबद्ध है। स्टालिन के इस बयान ने देश में एक बार फिर भाषाई गौरव और क्षेत्रीय अस्मिता की बहस को तेज कर दिया है।