डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी: ‘दो निशान, दो प्रधान’ के खिलाफ उठी आवाज, जिसने बदल दी देश की राजनीति
Dr. Syama Prasad Mukherjee: डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 'दो विधान, दो प्रधान और दो निशान' का विरोध करते हुए जम्मू-कश्मीर की विशेष व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन चलाया था।
- Written By: करुणा नंद शाहवाल
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी (सोर्स-सोशल मीडिया)
Syama Prasad Mookerjee Death Anniversary: ‘या तो मैं आपको भारतीय संविधान दिलाऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा।’ साल 1952 में जम्मू-कश्मीर में आयोजित एक विशाल जनसभा में जब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने यह संकल्प दोहराया था, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह केवल एक राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि उनके जीवन का अंतिम व्रत साबित होगा। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारतीय राजनीति के उन नेताओं में गिने जाते हैं, जिन्होंने देश की एकता और अखंडता के मुद्दे को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया। भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दिए जाने, अलग संविधान और परमिट व्यवस्था का खुलकर विरोध किया था।
उनका प्रसिद्ध नारा “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे” आज भी भारतीय राजनीति में गूंजता है। 23 जून 1953 को जम्मू-कश्मीर में हिरासत के दौरान उनकी रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। शिक्षा, राजनीति और राष्ट्र निर्माण के क्षेत्र में उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है। कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति से लेकर स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग मंत्री और जनसंघ के संस्थापक बनने तक, उनका जीवन भारतीय राजनीति के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।
कोलकाता में हुआ जन्म
बता दें कि 6 जुलाई 1901 को कलकत्ता (अब कोलकाता) में जन्मे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ऐसे परिवार से आते थे, जहां शिक्षा और राष्ट्र सेवा जीवन का आधार थी। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी बंगाल के प्रसिद्ध शिक्षाविद और बुद्धिजीवी थे।
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33 साल की उम्र में बने सबसे युवा कुलपति
कलकत्ता विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे 1923 में विश्वविद्यालय सीनेट के सदस्य बने। इंग्लैंड के लिंकन्स इन से बैरिस्टर की उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने कानून के क्षेत्र में भी सफलता हासिल की। लेकिन, उनका सबसे उल्लेखनीय शैक्षणिक योगदान तब सामने आया, जब मात्र 33 वर्ष की आयु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने।
उस समय उन्हें विश्व के सबसे युवा कुलपतियों में गिना जाता था। उनके कार्यकाल में विश्वविद्यालय में कई महत्वपूर्ण सुधार हुए और शिक्षा को आधुनिक दृष्टिकोण देने की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया गया।
नेहरू कैबिनेट से क्यों दिया इस्तीफा?
दरअसल डॉ. मुखर्जी का राजनीतिक जीवन भी उतना ही प्रभावशाली रहा। बंगाल विधान परिषद से लेकर अंतरिम सरकार तक उन्होंने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री बनाया।
हालांकि, 1950 में नेहरू-लियाकत समझौते के विरोध में उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। उनका मानना था कि राष्ट्रीय हितों और शरणार्थियों के अधिकारों के मुद्दे पर सरकार का रुख पर्याप्त दृढ़ नहीं है।
भारतीय जनसंघ की स्थापना का सफर
आपको बता दें कि डॉ. मुखर्जी इसी दौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर से विचार-विमर्श के बाद 21 अक्टूबर 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना की। यही संगठन आगे चलकर भारतीय राजनीति की एक महत्वपूर्ण धारा बना और बाद में भारतीय जनता पार्टी के रूप में विकसित हुआ।
‘दो निशान, दो प्रधान’ के खिलाफ आंदोलन
डॉ. मुखर्जी के राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय जम्मू-कश्मीर से जुड़ा हुआ है। उन्होंने स्वतंत्रता के बाद जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने और अलग संविधान, अलग झंडे तथा अलग व्यवस्था के प्रावधानों का खुलकर विरोध किया।
उनका मानना था कि यह व्यवस्था भारत की राष्ट्रीय एकता के लिए दीर्घकालिक चुनौती बन सकती है। इसी सोच से जन्मा उनका प्रसिद्ध नारा आज भी भारतीय राजनीति के इतिहास में दर्ज है, ”एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे।”
बिना परमिट कश्मीर पहुंचने पर गिरफ्तारी
उन्होंने संसद से लेकर सड़कों तक अनुच्छेद 370 और परमिट सिस्टम के खिलाफ अभियान चलाया। उस समय भारत के किसी नागरिक को जम्मू-कश्मीर में प्रवेश के लिए विशेष परमिट की आवश्यकता होती थी। डॉ. मुखर्जी ने इसे भारतीय नागरिकों के अधिकारों के विपरीत बताया। उन्होंने 11 मई 1953 को बिना परमिट जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने का निर्णय लिया। सीमा पार करते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और नजरबंद कर दिया गया।
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हिरासत में मौत और उठे सवाल
गिरफ्तारी के लगभग डेढ़ महीने बाद, 23 जून 1953 को हिरासत के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। आधिकारिक रूप से बीमारी को कारण बताया गया, लेकिन उनकी मृत्यु को लेकर अनेक सवाल उठे। उनकी माता, योगमाया देवी, ने भी स्वतंत्र जांच की मांग की थी। डॉ. मुखर्जी की मृत्यु ने पूरे देश को झकझोर दिया।
व्यापक जनदबाव के बाद जम्मू-कश्मीर में लागू परमिट सिस्टम समाप्त कर दिया गया। उनकी शहादत को राष्ट्रीय एकीकरण के संघर्ष का महत्वपूर्ण मोड़ माना गया।
