UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त! केंद्र और यूजीसी को थमाया नोटिस, क्या समाज बांटने की हो रही कोशिश?
Supreme Court on UGC: सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए समानता नियमों के खिलाफ याचिका पर केंद्र और यूजीसी को नोटिस जारी किया है। याचिका में नियमों को भेदभावपूर्ण और समाज बांटने वाला बताया गया है।
- Written By: अर्पित शुक्ला
सुप्रीम कोर्ट (सोर्स-आईएएनएस)
Supreme Court on UGC Regulations: सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ दायर की गई याचिका पर केंद्र सरकार, यूजीसी और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ने मूल याचिका के साथ टैग कर दिया है। याचिका भारतीय क्षत्रिय महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व सांसद कुंवर हरिवंश सिंह द्वारा दायर की गई है। याचिकाकर्ता ने यूजीसी पर आरोप लगाया है कि इसके माध्यम से समाज को बांटने की कोशिश की जा रही है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि जातिगत भेदभाव केवल आरक्षित वर्ग तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह किसी भी वर्ग के साथ हो सकता है, और इसलिए इसे कुछ समुदायों तक ही सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने लगाई थी रोक
इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी को यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने) विनियमों पर रोक लगाई थी, जिन्हें 13 जनवरी को अधिसूचित किया गया था। अदालत ने इसे “प्रारंभिक रूप से अस्पष्ट” बताते हुए कहा था कि इसके “बहुत व्यापक परिणाम” हो सकते हैं और यह समाज को बांटने का कारण बन सकता है। इस फैसले के बाद, इन नियमों के खिलाफ देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए थे।
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जयपुर में करणी सेना का विरोध
हाल ही में, जयपुर में राजपूत करणी सेना ने यूजीसी के इन नए विनियमों के खिलाफ प्रदर्शन किया था और इन नियमों को वापस लेने की मांग की थी। संगठन के अध्यक्ष महिपाल सिंह मकराना ने कहा था कि वे युवाओं के साथ किसी प्रकार का अन्याय नहीं होने देंगे।
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क्यों हो रहा विरोध?
याचिकाओं में यह आपत्ति उठाई गई है कि इन नियमों में जाति-आधारित भेदभाव केवल अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के सदस्यों तक ही सीमित किया गया है। विरोध करने वालों का कहना है कि इन नियमों में भेदभाव की परिभाषा से ऐसा लगता है कि जातिगत भेदभाव सिर्फ इन वर्गों के खिलाफ होता है। सामान्य वर्ग के छात्रों को ना तो कोई संस्थागत संरक्षण दिया गया है, और न ही उनके लिए कोई शिकायत निवारण प्रणाली (grievance redressal system) की व्यवस्था की गई है।
