सुप्रीम कोर्ट तलाक-ए-हसन की वैधता पर सख्त (सोर्स- सोशल मीडिया)
Supreme Court On Talaq-e-Hasan: सुप्रीम कोर्ट एक बार फिर मुस्लिम तलाक प्रथाओं की जांच कर रहा है। 26 नवंबर को होने वाली सुनवाई में तलाक-ए-हसन जैसी विवादित प्रथा पर बड़ा फैसला आ सकता है। जस्टिस सूर्यकांत ने इस प्रथा को महिलाओं की गरिमा के खिलाफ बताया और कड़े सवाल उठाए। इन सवालों का कोई संतोषजनक जवाब न मिलने से माना जा रहा है कि यह कुप्रथा खत्म हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-हसन प्रथा को लेकर सख्त टिप्पणी की है, जिसमें एक मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को लगातार तीन महीनों तक हर महीने एक बार ‘तलाक’ कहकर तलाक दे सकता है। बुधवार को कोर्ट ने साफ संकेत दिया कि यह प्रथा खत्म हो सकती है। जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि यह मामला समाज के बड़े हिस्से को प्रभावित करता है और कोर्ट को इसमें दखल देना पड़ सकता है।
खबरों के मुताबिक, जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अगर कोई प्रथा महिलाओं के अधिकारों और गरिमा पर चोट करती है, तो सुप्रीम कोर्ट को सुधारात्मक कदम उठाने होंगे। उनका कहना था कि एक सभ्य समाज में ऐसी परंपराओं या भेदभावपूर्ण तरीकों को जारी नहीं रखा जा सकता।
इन सवालों के जवाब न मिल पाने के कारण माना जा रहा है कि तलाक-ए-हसन भी तीन तलाक की तरह खत्म हो सकता है।
यह मामला पत्रकार बेनजीर हिना की 2022 की PIL पर आधारित है। उन्होंने दलील दी कि यह प्रथा अनुच्छेद 14, 15, 21 और 25 का उल्लंघन करती है। उन्होंने बताया कि उनके पति ने एक वकील के माध्यम से तलाक-ए-हसन नोटिस भेजकर तलाक दे दिया, जबकि उनसे दहेज मांगने की शिकायत भी थी।
कोर्ट ने कहा कि किसी वकील द्वारा भेजा गया तलाक नोटिस वैध नहीं माना जाएगा, क्योंकि उस पर पति के हस्ताक्षर नहीं होते। याचिकाकर्ता के वकील के अनुसार, अवैध तलाक से महिला बहुपत्नी जैसे हालात में फंस सकती है, खासकर जब पति पहले से दूसरी शादी कर चुका हो।
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तलाक-ए-हसन: तीन महीनों में हर महीने एक बार तलाक कहने की प्रक्रिया।
तलाक-ए-तफवीज: इसमें पति अपनी पत्नी को खुद तलाक देने का अधिकार सौंप सकता है। इससे पत्नी बिना कोर्ट जाए संगत परिस्थितियों में शादी खत्म कर सकती है।