

SC-ST Act Section 18A Challenge in Supreme Court: अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (SC/ST) एक्ट की कई धाराओं की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिका में खास तौर पर जमानत और गिरफ्तारी से जुड़ी सख्त धारा 18-A को हटाने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं ने इन प्रावधानों को संविधान में मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है। मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है।
अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की विभिन्न धाराओं को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है। वकील विष्णु शंकर जैन के माध्यम से बृजभूषण सैनी और 18 अन्य याचिकाकर्ताओं ने दायर याचिका में अधिनियम की धारा 3(1), 3(2)(i), 3(2)(v), 4, 8, 18, 18-A और 19 को चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि इनमें से कुछ प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 के तहत मिले समानता, जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानूनी प्रक्रिया से जुड़े अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।
याचिका में धारा 18-A पर खास तौर पर सवाल उठाया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस प्रावधान के तहत FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच जरूरी नहीं है। साथ ही गिरफ्तारी से पहले किसी तरह की पूर्व अनुमति की आवश्यकता भी नहीं होती।
याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, इससे व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है और पुलिस को आरोपों की प्रारंभिक जांच किए बिना कार्रवाई करनी पड़ सकती है। उन्होंने 2018 में संशोधन के जरिए जोड़ी गई धारा 18-A को सुप्रीम कोर्ट के 2018 के सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य फैसले के संदर्भ में चुनौती दी है। याचिका में दावा किया गया है कि संसद ने अदालत द्वारा दिए गए निर्देशों को प्रभावहीन करने के उद्देश्य से यह प्रावधान बनाया।
याचिका में धारा 18 को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, यह प्रावधान SC-ST एक्ट से जुड़े मामलों में अग्रिम जमानत के विकल्प को प्रतिबंधित करता है। उनका तर्क है कि झूठे या दुर्भावनापूर्ण आरोपों की स्थिति में इससे व्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा धारा 8 में कुछ परिस्थितियों में आरोपी के खिलाफ अनुमान से जुड़े प्रावधानों को भी निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के खिलाफ बताया गया है।
याचिका में धारा 19 के तहत एक्ट के अंतर्गत दोषसिद्ध मामलों में परिवीक्षा से जुड़ी राहत उपलब्ध नहीं होने पर भी सवाल उठाया गया है। वहीं, धारा 3(2)(v) के तहत अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति के खिलाफ अपराध किए जाने पर सजा बढ़ाने के प्रावधान और धारा 3(2)(i) से जुड़े मृत्युदंड के प्रावधान को भी संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित आनुपातिकता के सिद्धांत के आधार पर चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि कानून के कुछ प्रावधानों के कथित दुरुपयोग के कारण निर्दोष लोगों की गिरफ्तारी और लंबे समय तक मुकदमे की स्थिति पैदा हो सकती है।
याचिका के साथ दाखिल अंतरिम राहत आवेदन में धारा 8, 18, 18-A और 19 के संचालन पर रोक लगाने की मांग की गई है। आवेदन में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ जीवन और गरिमा की सुरक्षा का भी हवाला दिया गया है। इस मामले में केंद्र सरकार, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को पक्षकार बनाया गया है।