दो बार थोड़े ही मरूंगा...जब सुरक्षा की चेतावनी पर राजीव गांधी ने हंसकर दिया था यह जवाब, पहले भी हुआ था हमला

Rajiv Gandhi: पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पुण्यतिथि पर जानें कैसे पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने उन्हें पहले ही आगाह किया था, लेकिन एक चूक ने देश का इतिहास बदल दिया।
Rajiv Gandhi Death Anniversary
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी (सोर्स- सोशल मीडिया)
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Rajiv Gandhi Death Anniversary: 21 मई 1991 की शाम देश के राजनीतिक इतिहास की सबसे दुखद शामों में से थी। जब दिन तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में चुनाव प्रचार के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की आत्मघाती बम हमले में हत्या कर दी गई। देश अभी इंदिरा गांधी की हत्या के सदमे से पूरी तरह उबर भी नहीं पाया था कि सात साल बाद एक और गांधी परिवार के सदस्य की जान चली गई। इस हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था।

राजीव गांधी के दोस्त और आगे चलकर चुनाव आयोग के प्रमुख बने टी.एन. शेषन उन लोगों में से एक थे जिन्होंने राजीव की हत्या से पहले कई बार उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी। शेषन ने राजीव गांधी के साथ लंबे समय तक काम किया था। अपनी आत्मकथा ‘थ्रू द ब्रोकन ग्लास’ में शेषन ने कई ऐसे घटनाक्रम दर्ज किए हैं, जो बताते हैं कि उन्हें पहले से ही राजीव गांधी पर खतरे का अंदेशा था।

भीड़ के बीच जाने से बचें की सलाह

लोकसभा चुनाव 1991 में चल रहे थे। 20 मई को पहले चरण का मतदान हो चुका था। उस समय टी.एन. शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे। 10 मई 1991 को उन्होंने राजीव गांधी से निजी बातचीत में उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी। शेषन अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि उन्होंन राजीव को सलाह दी थी कि वे खुले मंचों और भीड़ के बीच जाने से बचें। लेकिन राजीव गांधी ने मुस्कराते हुए जवाब दिया, “मैं दो बार थोड़े ही मरूंगा।”

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जनता के बीच जाकर उनकी समस्याएं सुनते राजीव गांधी (सोर्स- सोशल मीडिया)

शेषन के मुताबिक, चार दिन बाद कांची मठ के शंकराचार्य ने भी संदेश भिजवाया था कि राजीव को सतर्क रहने के लिए कहा जाए। जब शेषन ने बताया कि उनकी चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है, तब सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय को फैक्स भेजा गया। यह संदेश 17 मई को राजीव गांधी के दफ्तर पहुंचा, लेकिन उससे पहले कि वह इसे पढ़ पाते, 21 मई को उनकी हत्या हो गई।

लिट्टे ने बदला लेने के लिए करवाई थी हत्या

जांच में सामने आया कि इस हत्या के पीछे श्रीलंका का उग्रवादी संगठन लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE) का हाथ था। कहा जाता है कि श्रीलंका में भारतीय शांति सेना (IPKF) भेजने और भारत-श्रीलंका समझौते के कारण संगठन राजीव गांधी से नाराज था। बाद में सुप्रीम कोर्ट और जांच एजेंसियों ने भी इस साजिश को लेकर कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखे।

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LEET ने की थी राजीव गांधी की हत्या (सोर्स- सोशल मीडिया)

राजीव गांधी की हत्या केवल एक राजनीतिक नेता की मौत नहीं थी, बल्कि यह भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर बड़ा हमला माना गया। उनकी मौत के बाद पूरे देश में सुरक्षा व्यवस्था और आतंकवाद के खिलाफ नीतियों पर गंभीर चर्चा शुरू हुई। इसी वजह से हर साल 21 मई को भारत में आतंकवाद विरोधी दिवस भी मनाया जाता है।

पहले भी हुआ था जानलेवा हमला

हालांकि इससे पहले भी राजीव गांधी पर जानलेवा हमला हो चुका था। 2 अक्टूबर 1986 को राजघाट में एक समारोह के दौरान राजीव गांधी पर हमला हुआ था, हालांकि वह बाल-बाल बच गए।  हालांकि, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री की सुरक्षा की जिम्मेदारी सीपीजी को दे दी गई और उनका कार को खास तौर पर बुलेट प्रूफ बनाया था। लेकिन राजीव अक्सर सुरक्षा को लेकर दी जाने वाली सलाह को अनदेखा करते थे।

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राजीव गांधी (सोर्स- सोशल मीडिया)

भारत-श्रीलंका समझौते के दौरान कोलंबो यात्रा को लेकर भी उन्हें ऐसे न करने की सलाह दी गई थी। लेकिन राजीव गांधी ने इसे नजरअंदाज किया था। वहां परेड के दौरान एक सैनिक ने उन पर राइफल की बट से हमला कर दिया था, हालांकि वे सुरक्षित बच गए। राजीव गांधी सहज और मिलनसार नेता थे। वे जनता के बीच खुलकर जाते थे और यही आदत आखिरकार उनके लिए घातक साबित हुई। 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में चुनाव प्रचार के दौरान आत्मघाती विस्फोट में उनकी मौत हो गई और देश ने अपने सबसे युवा पूर्व प्रधानमंत्री को खो दिया।

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