

निर्धारित नियमों के तहत कोई व्यक्ति पार्टी-इन-पर्सन के रूप में अपना मामला रख सकता है।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने की प्रक्रिया में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
याचिका दाखिल करना ही काफी नहीं, रजिस्ट्री की जांच और सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होने की प्रक्रिया पूरी करनी होती है।
Supreme Court Petition Rule and Process: मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का आंदोलन अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी सांसदों ने शीर्ष अदालत में अपनी मांगें रखने की रणनीति बनाई है। विपक्षी नेताओं ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपने की कोशिश की, लेकिन सीजेआई ने मिलने से इनकार करते हुए अपनी मांगें याचिका के रूप में अदालत के सामने रखने को कहा।
इसके बाद राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सुप्रीम कोर्ट जाने और याचिका दाखिल करने की बात कही। ऐसे में सवाल है कि सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने की प्रक्रिया क्या है? क्या राहुल गांधी खुद याचिका दाखिल कर सकते हैं या इसके लिए वकील होना जरूरी है? आइए, समझते हैं कि देश की सर्वोच्च अदालत में याचिका कैसे दाखिल की जाती है।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने से पहले यह तय करना जरूरी होता है कि मामला अदालत के किस अधिकार क्षेत्र में आता है। हर विवाद सीधे सुप्रीम कोर्ट नहीं पहुंच सकता। संविधान और अदालत के नियमों के तहत अलग-अलग मामलों के लिए अलग-अलग प्रक्रियाएं निर्धारित हैं।
उदाहरण के लिए, मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का मामला होने पर संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दाखिल की जा सकती है। वहीं, हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने के लिए मामले की प्रकृति के अनुसार विशेष अनुमति याचिका (SLP) या अपील का रास्ता अपनाया जा सकता है। संविधान की व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल भी निर्धारित परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट के सामने रखे जा सकते हैं।
याचिका दाखिल करने से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि याचिकाकर्ता अदालत से क्या राहत चाहता है और उसके दावे का कानूनी आधार क्या है। किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के कामकाज से असहमति होना अपने आप में किसी भी तरह की याचिका के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।
याचिका में मामले के तथ्य, कानूनी आधार, संबंधित संवैधानिक प्रावधान और अदालत से मांगी गई राहत का स्पष्ट उल्लेख करना होता है। मामले के अनुसार संबंधित दस्तावेज, हलफनामा और अन्य जरूरी कागजात भी संलग्न किए जाते हैं।
इसके बाद याचिका सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार दाखिल की जाती है। इसके लिए अदालत की ई-फाइलिंग व्यवस्था का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। रजिस्ट्री याचिका के प्रारूप, दस्तावेजों और प्रक्रियागत जरूरतों की जांच करती है। यदि कोई कमी मिलती है, तो उसे दूर करना पड़ता है। इसके बाद मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
हां, निर्धारित नियमों और शर्तों के अधीन कोई व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट में अपना मामला खुद भी रख सकता है। इसके लिए अदालत में पार्टी-इन-पर्सन यानी स्वयं अपना पक्ष रखने वाले पक्षकार का प्रावधान है। यदि राहुल गांधी खुद याचिकाकर्ता बनते हैं, तो वे भी लागू नियमों के अनुसार इस विकल्प का इस्तेमाल कर सकते हैं।
हालांकि, याचिका खुद तैयार करना, उसे निर्धारित प्रक्रिया के तहत दाखिल करना और अदालत में खुद बहस करना अलग-अलग बातें हैं। सुप्रीम कोर्ट में सामान्य तौर पर याचिका दाखिल करने और मामले की पैरवी की प्रक्रिया में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AOR) की अहम भूमिका होती है। एओआर वह वकील होता है जो निर्धारित नियमों के तहत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने और मामले को आगे बढ़ाने के लिए अधिकृत होता है।
जो व्यक्ति खुद अदालत में पेश होकर अपने मामले की पैरवी करना चाहता है, उसे लागू प्रक्रिया के अनुसार पार्टी-इन-पर्सन के रूप में पेश होने की अनुमति लेनी पड़ सकती है। अदालत यह भी तय कर सकती है कि मामले को किस तरह आगे बढ़ाया जाए।
इसलिए राहुल गांधी का सांसद या लोकसभा में विपक्ष का नेता होना उन्हें अपने आप सुप्रीम कोर्ट में किसी भी मामले की पैरवी करने का विशेष अधिकार नहीं देता। उन्हें भी लागू कानूनी और प्रक्रियागत नियमों का पालन करना होगा।
चुनाव आयोग और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े मुद्दों पर यदि पहले से याचिकाएं लंबित हैं, तो राहुल गांधी या अन्य विपक्षी नेता की ओर से दाखिल नई याचिका में उठाए गए सवालों की तुलना उन मामलों से की जा सकती है।
यदि याचिकाओं में समान कानूनी प्रश्न या मिलती-जुलती राहत की मांग हो, तो सुप्रीम कोर्ट उन्हें एक साथ सुनने या साझा प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाने पर विचार कर सकता है। हालांकि, ऐसा अपने आप नहीं होता। अदालत याचिकाओं के तथ्यों, कानूनी आधार और मांगी गई राहत को देखकर फैसला करती है।
नई याचिका दाखिल होने के बाद भी रजिस्ट्री की जांच और सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। याचिका दाखिल करना अपने आप में इस बात की गारंटी नहीं है कि अदालत मांगी गई राहत देगी या मामले को तत्काल सुनवाई के लिए स्वीकार कर लेगी।