पाकिस्तान की नई गीदड़भभकी! भारत के बांधों पर हमले की फिराक में PAK? पूर्व कानून मंत्री ने फिर उगला जहर
Pakistan war threat to India: एक लेख में अहमर बिलाल सूफी ने यह गंभीर सवाल उठाया है कि क्या युद्ध की स्थिति में पाकिस्तान, चिनाब नदी के ऊपरी हिस्से में बन रहे भारतीय बांधों को निशाना बना सकता है?
- Written By: मनोज आर्या
भारत पर हमले के फिराक में पाकिस्तान? (AI जेनरेटेड इमेज)
Pakistan war threat over dams: भारत और पाकिस्तान के बीच पानी के बंटवारे को लेकर जारी तनाव लगातार गहराता जा रहा है। पहलगाम हमले के बाद भारत द्वारा ‘सिंधु जल संधि’ को निलंबित किए जाने और चिनाब नदी पर बांध बनाने की योजनाओं को गति देने से पाकिस्तान पूरी तरह बौखलाया हुआ है। पाकिस्तानी नेताओं और सैन्य अधिकारियों की तरफ से युद्ध की धमकियों के बीच, पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और पूर्व कार्यवाहक कानून मंत्री अहमर बिलाल सूफी ने एक बड़ा और चौंकाने वाला दावा किया है। सूफी का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कानून के कुछ नियम ऐसे भी हैं, जो भारत द्वारा बनाए जा रहे बांधों को सैन्य हमलों से पूरी तरह सुरक्षा कवच प्रदान नहीं करते हैं।
पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ में लिखे अपने एक लेख में अहमर बिलाल सूफी ने यह गंभीर सवाल उठाया है कि क्या युद्ध की स्थिति में पाकिस्तान, चिनाब नदी के ऊपरी हिस्से में बन रहे भारतीय बांधों को निशाना बना सकता है? गौरतलब है कि भारत इस समय चिनाब नदी पर पांच बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं पर तेजी से काम कर रहा है, जिनमें पाकल डुल, किरू, क्वार, रातले और सवालकोट शामिल हैं।
जिनेवा कन्वेंशन का आर्टिकल 56 का तर्क
अहमर बिलाल सूफी के विश्लेषण के मुताबिक, युद्ध के दौरान बांधों और जल प्रणालियों जैसी संवेदनशील संरचनाओं को सुरक्षा देने का मामला 1949 के जिनेवा कन्वेंशन के ‘एडिशनल प्रोटोकॉल I’ के आर्टिकल 56 के तहत आता है। सामान्य तौर पर अंतरराष्ट्रीय कानून युद्ध की स्थिति में भी बांधों पर हमले की इजाजत नहीं देता, क्योंकि इससे आम आबादी को बड़ा नुकसान हो सकता है।
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पाक के पास निशाना बनाने की कई वजह
अंतरराष्ट्रीय कानून में एक बड़ा अपवाद यह भी है कि यदि किसी नागरिक संरचना या बांध का इस्तेमाल दूसरे देश के खिलाफ ‘सैन्य या आक्रामक मकसद’ के लिए किया जा रहा हो, तो वह अपनी सुरक्षा का कानूनी अधिकार खो देता है। सूफी का दावा है कि भारत के मौजूदा रुख के कारण इन बांधों को पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता, क्योंकि इन्हें पाकिस्तान के खिलाफ एक रणनीतिक हथियार के रूप में देखा जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय नियमों का हवाला देते हुए उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई ऊपरी तटीय देश पानी रोककर निचले तटीय देश की कृषि, सिंचाई और खाद्य सुरक्षा को तबाह करने की कोशिश करता है, तो पीड़ित देश के पास उस निर्माण को रोकने या उसे निशाना बनाने की वजह मौजूद होती है।
केंद्रीय जल मंत्री सीआर पाटिल का बयान
अपने दावों को मजबूत करने के लिए पूर्व पाकिस्तानी कानून मंत्री ने भारत की ओर से आए दो बड़े संदर्भों का उदाहरण दिया है। भारत के केंद्रीय जल मंत्री सीआर पाटिल का वह बयान, जिसमें उन्होंने कहा था कि आने वाले समय में पाकिस्तान को पानी की एक बूंद भी नहीं दी जाएगी। इसके अलावा भारत का यह आधिकारिक रुख कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ अभी खत्म नहीं हुआ है। सूफी के अनुसार, भारत के ये तेवर पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह दलील देने का मौका देते हैं कि ये परियोजनाएं केवल बिजली बनाने के लिए नहीं, बल्कि पाकिस्तान को प्यासा मारने के आक्रामक इरादे से बनाई जा रही हैं।
यदि पानी रुकने से पाकिस्तान के सामने भुखमरी और सिंचाई का संकट खड़ा होता है, तो अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में रहकर इस निर्माण को बाधित करने वाले किसी भी कदम को सही ठहराया जा सकता है।
भारत ने खुद कमजोर की अपनी सुरक्षा?
अहमर बिलाल सूफी ने अपने लेख के अंत में एक और महत्वपूर्ण रणनीतिक बिंदु उठाया है। उनका कहना है कि भारत इन परियोजनाओं को पाकिस्तान को ‘सजा देने’ के माध्यम के रूप में पेश कर रहा है। अगर भारत सिंधु जल संधि के तकनीकी नियमों के तहत ये बांध बनाता, तो पाकिस्तान इस पर कोई कानूनी आपत्ति नहीं कर पाता। लेकिन संधि को एकतरफा निलंबित करके भारत ने खुद ही इन बांधों को मिलने वाली अंतरराष्ट्रीय कानूनी सुरक्षा को कमजोर कर दिया है।
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इसके अलावा, उन्होंने एक सैन्य पहलू का जिक्र करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत केवल उन्हीं बांधों को पूर्ण सुरक्षा मिलती है जो पानी से लबालब भरे हों (क्योंकि उनके टूटने से भारी नागरिक तबाही का खतरा होता है)। निर्माण के चरण में चल रहे या ‘खाली बांधों’ को यह सुरक्षा हासिल नहीं होती क्योंकि उनके ढहने से तत्काल बाढ़ का खतरा नहीं होता। सूफी के मुताबिक, पाकिस्तान के रणनीतिक और सैन्य विशेषज्ञ इस कानूनी बारीकी से अच्छी तरह वाकिफ हैं।
