मुस्लिम महिलाओं को मिलेगा इंसाफ…एक्शन मोड में CJI सूर्यकांत, इस्लामी कुप्रथा का होगा अंत?
Supreme Court on Talaq Cases: सुप्रीम कोर्ट जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई में तलाक-ए-हसन की मुस्लिम प्रथा की जांच कर रहा है, जो महिलाओं की गरिमा और मौलिक अधिकारों को प्रभावित कर सकती है।
- Written By: अक्षय साहू
सुप्रीम कोर्ट में तलाक-ए-हसन पर सुनवाई (सोर्स- सोशल मीडिया)
CJI Suryakant Bench Hearing on Talaq E Hasan:भारत के नए मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ इस समय तलाक-ए-हसन की मुस्लिम प्रथा की जांच कर रही है। इस प्रथा में कोई मुसलमान पति अपनी पत्नी को तीन महीने के भीतर तीन बार तलाक कहकर शादी समाप्त कर सकता है। जस्टिस सूर्यकांत ने मामले की सुनवाई के दौरान कई गंभीर सवाल उठाए।
उन्होंने सुनवाई के दैरान पूछा कि क्या इस तरह की प्रथा को सभ्य समाज में जारी रहने देना उचित है और क्या यह महिलाओं की गरिमा के संरक्षण के साथ संगत है। उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले को संविधान पीठ के पास भेजने पर विचार करेगा। इस मामले की अगली सुनवाई 26 नवंबर को निर्धारित है। याचिका पत्रकार बेनजीर हीना ने दायर की है, जिन्होंने तर्क दिया कि तलाक-ए-हसन मौलिक अधिकारों, विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 25 का उल्लंघन करती है।
मुस्लिम समाज में तलाक की कई प्रथाएं
विशेषज्ञों के मुताबिक, मुस्लिम समाज में तलाक की कई प्रथाएं हैं। तलाक-ए-सुन्नत, जिसे तलाक-उल-राजे भी कहा जाता है, दोनों शिया और सुन्नी मानते हैं। इसमें हमेशा सुलह और समझौते का अवसर होता है और यह वैध तलाक का तरीका माना जाता है। इसके अलावा भी मुस्लिम समुदाय में तलाक के कई और प्रथाएं है।
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तलाक-ए-इद्दत
तलाक-ए-इद्दत में तलाक के बाद महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा का ध्यान रखा जाता है। इद्दत अवधि आम तौर पर तीन महीने की होती है, जिसमें पत्नी की तीन मासिक चक्रों को ध्यान में रखा जाता है। यदि पत्नी गर्भवती है, तो यह अवधि बच्चे के जन्म तक बढ़ाई जा सकती है। इस दौरान पति और पत्नी के बीच यौन संबंध नहीं बन सकता।
तलाक-ए-हसन
तलाक-ए-हसन की प्रथा में तीन महीने के भीतर तीन बार तलाक देना शामिल है, लेकिन यह तभी मान्य होता है जब पत्नी का मासिक चक्र नहीं चल रहा हो। यदि मासिक चक्र चल रहा हो, तो तलाक की घोषणा अगले 30 दिनों में हर महीने करनी होती है। यह प्रथा भारत में मुस्लिम महिला (विवाह संरक्षण) अधिनियम, 2019 के तहत अपराध नहीं है।
तलाक-ए-अहसन
तलाक-ए-अहसन में पति एक लाइन में तलाक कहकर शादी खत्म कर सकता है। यह केवल तभी मान्य होता है जब पत्नी का मासिक चक्र नहीं चल रहा हो।
तलाक-ए-बिद्दत
तलाक-ए-बिद्दत या ट्रिपल तलाक को सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में शायरा बानो बनाम भारत संघ के मामले में अवैध घोषित किया। यह सुन्नी समुदाय में प्रचलित था और इसमें पति तीन बार तलाक कहकर विवाह समाप्त कर सकता था। अब यह मुस्लिम महिला (विवाह संरक्षण) अधिनियम, 2019 के तहत अपराध है।
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इसके अतिरिक्त, इस्लामी प्रथाओं में अन्य तलाक के तरीके भी हैं। तुहर एक अस्थायी अलगाव है जिसमें पति कुछ समय तक पत्नी से यौन संबंध नहीं बनाता। जिहार में पति पत्नी की तुलना किसी अन्य महिला से करता है, जिससे संबंध बनाना वर्जित हो जाता है। इस प्रथा के प्रायश्चित के रूप में पति को गुलाम मुक्त करना या दो महीने का उपवास करना पड़ता है। मुबारत एक आपसी सहमति पर आधारित तलाक है, जिसमें पति और पत्नी दोनों अपनी इच्छा से विवाह समाप्त करने के लिए सहमत होते हैं।
