विपक्षी खेमे में नेतृत्व की जंग: अय्यर ने स्टालिन-ममता को बताया राहुल से बेहतर विकल्प, क्या दरक रहा ‘इंडिया’?
Opposition PM Face : मणिशंकर अय्यर के बयान के बाद विपक्षी गठबंधन में अगले चुनाव के लिए पीएम फेस को लेकर बहस तेज हो गई है। इस रेस से स्टालिन ने खुद को अलग रखने के संकेत दिए हैं। इस चर्चा छिड़ गई है।
- Written By: रंजन कुमार
मणिशंकर अय्यर। इमेज-सोशल मीडिया
BJP VS Opposition : विपक्ष के भीतर प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर चल रही रस्साकशी अब बंद कमरों से बाहर निकलकर सार्वजनिक मंचों पर आ गई है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर के हालिया बयान ने ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के भीतर नेतृत्व की एक नई बहस छेड़ दी है।
खुद को राजीववादी बताने वाले अय्यर ने राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता के बजाय क्षेत्रीय क्षत्रपों-एमके स्टालिन और ममता बनर्जी पर दांव लगाने की बात कहकर राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है।
अय्यर का ‘स्टालिन’ कार्ड और दक्षिण की राजनीति
चेन्नई के एक कार्यक्रम में अय्यर ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की तुलना कांग्रेस के दिग्गज नेता के. कामराज से करते हुए उन्हें गठबंधन का चेहरा बनाने की वकालत की। हालांकि, स्टालिन ने बड़ी ही परिपक्वता के साथ इस प्रस्ताव को यह कहकर टाल दिया कि मैं अपनी ऊंचाई जानता हूं। स्टालिन का यह बयान संकेत देता है कि वह फिलहाल तमिलनाडु की सत्ता पर पकड़ मजबूत रखते हुए दिल्ली में किंग के बजाय किंगमेकर की भूमिका निभाने में अधिक सहज हैं।
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ममता का मौन समर्थन और राहुल की चुनौतियां
एक तरफ जहां उमर अब्दुल्ला और अखिलेश यादव जैसे नेता राहुल गांधी को भाजपा के खिलाफ एकमात्र राष्ट्रीय विकल्प मानते हैं। वहीं, ममता बनर्जी की महत्वाकांक्षाएं छिपी नहीं हैं। ममता का बायोडेटा चुनाव जीतने के मामले में काफी प्रभावी है। उन्होंने न केवल 2011 में वामपंथ को उखाड़ा बल्कि पिछले एक दशक से भाजपा के विजय रथ को बंगाल की सीमाओं पर रोक रखा है। दूसरी ओर, स्टालिन का स्ट्राइक रेट (2019, 2021, 2024) उन्हें गठबंधन के भीतर सबसे विश्वसनीय सहयोगी बनाता है।
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भाजपा का तंज और आंतरिक कलह
मणिशंकर अय्यर के इस बयान ने भाजपा को बैठे-बिठाए मुद्दा दे दिया है। भाजपा प्रवक्ताओं का कहना है कि जब कांग्रेस के अपने ही दिग्गज नेताओं को राहुल गांधी की स्वीकार्यता पर संदेह है, तो देश उन पर भरोसा कैसे करेगा? 2029 की चुनावी बिसात पर अब सवाल यह है कि क्या विपक्ष एक चेहरा’ (राहुल गांधी) के साथ आगे बढ़ेगा या क्षेत्रीय नेतृत्व (ममता-स्टालिन) के मॉडल को अपनाएगा? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष की असली चुनौती मोदी के कद के बराबर चेहरा ढूंढना नहीं, बल्कि आपसी मतभेदों को सुलझाना है।
