

Karnataka High Court On Wife Maintenance Case: कर्नाटक हाई कोर्ट ने गुजारा भत्ता से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि हर पत्नी को सिर्फ इसलिए भरण-पोषण का अधिकार नहीं दिया जा सकता क्योंकि वह महिला है। अदालत ने कहा कि यदि पत्नी आर्थिक रूप से सक्षम है, उसकी आय पति से अधिक है और उस पर बच्चों की देखभाल जैसी अतिरिक्त जिम्मेदारियां भी नहीं हैं।
तो अदालतों को केवल पारंपरिक सोच के आधार पर पति को गुजारा भत्ता देने का आदेश नहीं देना चाहिए। जस्टिस चिल्लकुर सुमलता ने स्पष्ट किया कि मेंटेनेंस का उद्देश्य जरूरतमंद जीवनसाथी को आर्थिक सहायता देना है, न कि इसे स्वत: मिलने वाला अधिकार माना जाए। हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी एक मामले में निचली अदालत के अंतरिम गुजारा भत्ता आदेश को रद्द करते हुए की।
जस्टिस चिल्लकुर ने चेताते हुए फैमिली कोर्ट को कहा कि अगर पत्नी आर्थिक रूप से मजबूत है, और उसकी कमाई पति से कहीं ज्यादा है। उसे सिर्फ बच्चों की देखभाल करना है, तो कोर्ट को इस आधार पर निर्णय नहीं लेना चाहिए कि पति को पत्नी का सारा खर्चा उठाना पड़ता है। इसके साथ -साथ यह भी जरूरी समझा जाए की पति का कर्तव्य पत्नी को संभालना और उसकी देखभाल करना होता है।
उन्होनें कोर्ट से कहा कि महिला को गुजारा भत्ता तभी देना चाहिए जब यह पूरी तरह से साबित हो जाए कि महिला के पास अपने पति के जीवन स्तर (Standard of Living) के अनुसार खुद को बनाए रखने के लिए आय का कोई स्रोत न हो।
जस्टिक ने फैमिली कोर्ट को चेतावनी देते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट जेंडर-आधारित सोच से बाहर निकले, पत्नियों को हमेशा उसके पती से ही गुजारा भत्ता मिलना चाहिए। यह बात अदालत ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को रद्द करते हुए कहा जब एक आदमी को उसकी अगल रह रही पत्नि को गुजारा भत्ता के तौर पर 20 हजार रुपये की राशी प्रत्येक माह देने का आदेश दिया ।
दरअसल एक व्यक्ति ने कर्नाटक हाईकोर्ट में पिटीशन दायर किया था। उसने सुनवाई के दौरान कहा कि ट्रायल कोर्ट ने उसके इस बात पे विचार नहीं दिया कि वह प्रत्येक महीने 60 हजार रुपये कमाता है। लेकिन वहीं उसकी पत्नी प्रत्येक महीने 1 लाख से ज्यादा कमाती है। हाईकोर्ट नें इस तर्क को स्वीकारा और कहा कि आदेश को पारित करते समय उसकी पत्नी की कमाई को अनदेखा किया था।