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Explainer: GPFG क्या है? मछुआरों के देश से दुनिया का सबसे अमीर देश कैसे बना नॉर्वे, भारत से चार गुना है दौलत

PM Modi Norway Visit: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नॉर्वे यात्रा के दौरान क्लीन एनर्जी, तेल-गैस और AI साझेदारी पर समझौते हुए। जानिए कैसे मछली पकड़ने वाला देश दुनिया का सबसे अमीर निवेशक बना।

  • Written By: अक्षय साहू
Updated On: May 22, 2026 | 09:31 AM

नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोरे के साथ पीएम मोदी (सोर्स- @narendramodi)

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Norway Sovereign Wealth Fund: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल ही में पांच देशों की यात्रा पर गए। इस दौरे का उद्देश्य भारत की ऊर्जा जरूरतों को मजबूत करना और उभरती तकनीकों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण साझेदारियां स्थापित करना था। अपने इस दौरे के दौरान पीएम मोदी ने यूएई, फिनलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली का दौरा किया, जहां उनकी मौजूदगी में कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए।

पीएम मोदी की विदेश यात्राएं हमेशा चर्चा में रहती हैं, लेकिन इस बार उनका नॉर्वे दौरा खास रहा। 43 साल बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने नॉर्वे की यात्रा की। कभी मछली पकड़ने और लकड़ी काटने पर निर्भर यह देश आज दुनिया के सबसे अमीर देशों में गिना जाता है। जिसका सरकारी फंड इनता बड़ा है कि इसकी हिस्सेदारी दुनिया की करीब 7000 कंपनियों में है। आइए आपको बताते हैं कि एक देश जो जहां के लोग कभी दो वक्त की रोटी कमाने के लिए मछली पकड़ने और लकड़ी काटने का काम करने को मजबूर था वो इतना अमीर कैसे बना? पीएम मोदी की नॉर्वे यात्रा से भारत को क्या मिला? 

मछली पकड़ने वाले देश से, सबसे बड़े सॉवरेन फंड तक

नॉर्वे का सॉवरेन वेल्थ फंड दुनिया की सबसे बड़ा सरकारी फंड है। उत्तरी यूरोप में स्थित यह छोटा सा देश आबादी के हिसाब से बहुत छोटा है लेकिन आर्थिक नजरिए से नॉर्वे की गिनती दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में होती है। नॉर्वे की कुल आबादी लगभग 56 लाख है, जो भारत के कई बड़े शहरों से भी कम है।

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नॉर्वे का सॉवरेन वेल्थ फंड दुनिया की सबसे बड़ा सरकारी फंड है (AI जनरेडेट फोटो)

इसके बावजूद नॉर्वे के पास दुनिया का सबसे बड़ा सरकारी निवेश फंड है जिसकी कुल कीमत करीब 2.1 ट्रिलियन डॉलर है यानी भारतीय रुपयों में करीब 175 लाख करोड़ रुपय। अगर इस सरकारी फंड़ को नॉर्वे के सभी नागरिकों में बांट दिया जाए तो हर व्यक्ति को करीब 3.5 करोड़ों रुपये मिलेंगे। इस फंड का आधिकारिक नाम गवर्नमेंट पेंशन फंड ग्लोबल (GPFG) है।

किन कंपनियों में है GPFG की हिस्सेदारी

दुनिया की कई बड़ी कंपनियों में है निवेश (AI जनरेटेड फोटो)

नॉर्वे पहले से ही दुनिया के दर्जनों देशों की हजारों कंपनियों में निवेश कर चुका है। रिपोर्ट के मुताबिक,  GPFG ने करीब 68 देशों के 7,200 से अधिक कंपनियों मे निवेश कर रहा है। इसमें एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट, एनवीडिया, टेस्ला और अमेजन जैसी कंपनियों के नाम शामिल हैं। अब भारत भी इस निवेश का बड़ा भागीदार बनना चाहता है। भारत विशेष रूप से ग्रीन एनर्जी और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में नॉर्वे की पूंजी को आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है। इसके अलावा भारतीय शेयर बाजार में इस फंड का लगभग 28 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश है, जिसमेंरिलायंस इंडस्ट्रीज, टीसीएस, इंफोसिस, एचडीएफसी बैंक, और एक्सिस बैंक जैसी बड़ी भारतीय कंपनियां शामिल हैं।

कैसे बदली नॉर्वे की किस्मत

नॉर्वे हमेशा से इतना अमीर नहीं था। 1960 के दशक तक यह देश यूरोप के बाकी देशों की तुलना में गरीब माना जाता था। यहां की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से मछली पकड़ने, लकड़ी काटने और समुद्री जहाजों पर काम करने पर निर्भर थी। उस समय नॉर्वे में बड़े उद्योग या आधुनिक तकनीकी विकास नहीं थे। देश की भौगोलिक परिस्थितियां भी कठिन थीं और लोगों का जीवन साधारण था।

नॉर्वे की किस्मत तब बदली जब 1960 के दशक में समुद्र के नीचे तेल और गैस की खोज शुरू हुई। साल  1965 में नॉर्वे की सरकार ने कई विदेशी कंपनियों को समुद्र में तेल खोजने के लाइसेंस दिए। शुरुआत में कई प्रयास असफल रहे लेकिन 23 दिसंबर 1969 को एकोफिस्क क्षेत्र में विशाल तेल भंडार की खोज हुई। यह खोज नॉर्वे के इतिहास का सबसे बड़ा आर्थिक मोड़ साबित हुई। 1971 से नॉर्वे ने बड़े पैमाने पर तेल उत्पादन और निर्यात शुरू कर दिया। देखते ही देखते देश की आय तेजी से बढ़ने लगी और नॉर्वे अमीर देशों की सूची में शामिल हो गया।

खाड़ी देशों से अपना अलग रुख 

तेल की बिक्री से अचानक बढ़ी आमदनी ने नॉर्वे के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दीं। शुरुआत में सरकार यह तय नहीं कर पा रही थी कि इतनी बड़ी रकम का इस्तेमाल कैसे किया जाए। जहां खाड़ी देशों ने तेल से मिली दौलत को आलीशान इमारतों और लग्जरी लाइफस्टाइ पर खर्च किया, वहीं नॉर्वे ने इसे सोच-समझकर इस्तेमाल करने की कोशिश की। अर्थशास्त्र में इस स्थिति को “रिसोर्स कर्स” यानी संसाधनों का अभिशाप कहा जाता है।

कहां-कहां निवेश करता नॉर्वे (AI जनरेडेट फोटो)

1975 में सरकार ने तेल कंपनियों पर भारी टैक्स लगाया जिससे सरकारी खजाना तेजी से भरने लगा। सरकार ने बड़े पैमाने पर खर्च और सब्सिडी देना शुरू किया। इससे देश में महंगाई बढ़ गई और आर्थिक संतुलन बिगड़ने लगा। इसके बाद 1980 के दशक में नॉर्वे की अर्थव्यवस्था तेल की कमाई पर बहुत अधिक निर्भर हो गई। जब 1986 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेजी से गिर गईं तो नॉर्वे की अर्थव्यवस्था संकट में आ गई। बेरोजगारी बढ़ी और बैंकिंग सेक्टर कमजोर हुआ और देश को आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ा।

1990 में रखी GPFG नींव

इन कठिन अनुभवों से नॉर्वे ने महत्वपूर्ण सबक सीखे। सरकार ने समझ लिया कि तेल हमेशा नहीं रहेगा और केवल प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहना खतरनाक हो सकता है। इसी सोच के आधार पर 1990 में गवर्नमेंट पेट्रोलियम फंड एक्ट बनाया गया। इस कानून के तहत तेल से होने वाली कमाई केवल वर्तमान पीढ़ी की संपत्ति नहीं है बल्कि आने वाली पीढ़ियों की भी अमानत है। इसलिए तेल से होने वाली कमाई को सुरक्षित और स्थायी संपत्ति में बदलने का फैसला किया गया। 

1996 में पहली बार इस फंड में 400 मिलियन डॉलर जमा किए गए। धीरे-धीरे यह राशि बढ़ती गई और आज यह दुनिया का सबसे बड़ा सॉवरेन वेल्थ फंड बन चुका है। इस फंड का संचालन नॉर्जेस बैंक इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट नामक संस्था करती है।

सॉवरेन वेल्थ फंड को लेकर सख्त नियम

नॉर्वे ने इस फंड के संचालन के लिए कुछ बेहद सख्त नियम बनाए हैं। 

पहला नियम: तेल से होने वाली कमाई को सीधे देश के भीतर खर्च नहीं किया जाएगा। सरकार इन पैसों   को विदेशी मुद्राओं (डॉलर और यूरो) में बदलकर दुनियाभर के शेयर बाजारों और अंतरराष्ट्रीय संपत्तियों में निवेश करती है। इसका उद्देश्य यह है कि देश के भीतर अधिक पैसा आने से महंगाई न बढ़े।

दूसरा नियम: सरकार फंड की मूल राशि को कभी नहीं छू सकती। हर साल केवल फंड के औसत लाभ का लगभग 3 प्रतिशत हिस्सा ही सरकारी बजट में इस्तेमाल किया जाता है। इससे फंड लगातार बढ़ता रहता है और भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रहता है।

तीसरा नियम: नॉर्वे का फंड केवल मुनाफे के आधार पर निवेश नहीं करता बल्कि नैतिक मूल्यों को भी महत्व देता है। यह फंड उन कंपनियों में निवेश नहीं करता जो परमाणु हथियार बनाती हैं तंबाकू या नशीले पदार्थों का उत्पादन करती हैं बाल श्रम का उपयोग करती हैं या पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचाती हैं।

इसी नीति के कारण नॉर्वे के फंड ने भारत के कुछ बड़े कारोबारी समूहों पर भी कार्रवाई की है। अडाणी पोर्ट्स को म्यांमार की सैन्य सरकार से जुड़े आरोपों के कारण ब्लैकलिस्ट किया गया था। बाद में अडाणी ग्रीन से भी फंड ने अपने निवेश वापस ले लिए थे हालांकि बाद में कुछ आरोप खारिज हो गए।

भारत के साथ किन समझौतों पर बनी बात 

पीएम मोदी के नॉर्वे दौरान दोनों देशों के बीच क्लीन एनर्जी प्रोजेक्ट पर बड़ी डील हुई। नॉर्वे अपनी 98% बिजली स्वच्छ ऊर्जा से बनाता है। भारत भी आने वाले समय में इस क्षेत्र में प्रगति करना चाहता है, समझौते के तहत नॉर्वे भारत के क्लीन एनर्जी प्रोजेक्ट में निवेश करेगा। 

यह भी पढ़ें- प्रयागराज में खाकी के एकतरफा झुकाव से भड़के डॉक्टर! ठप होगी पूरी स्वास्थ्य सेवा, महा-संग्राम का ऐलान

इसके अलावा भारत सरकार ने नॉर्वे से तेल और प्राकृतिक गैस के व्यापार को बढ़ावा देने का फैसला किया है, ताकि आपातकाल की स्थिति में भारत को ऊर्जा संकट का सामना न करना पड़े। इसके अलावा भारत और नॉर्वे के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़ी तकनीक को लेकर भी समझौते हुए। 

💡

Frequently Asked Questions

  • Que: नॉर्वे इतना अमीर कैसे बना?

    Ans: 1969 में तेल और गैस भंडार मिलने के बाद नॉर्वे ने तेल से कमाई को समझदारी से निवेश किया। इसी वजह से उसका सॉवरेन वेल्थ फंड आज दुनिया का सबसे बड़ा फंड बन गया।

  • Que: नॉर्वे का GPFG फंड क्या है?

    Ans: GPFG नॉर्वे का सरकारी सॉवरेन वेल्थ फंड है। इसकी कीमत करीब 2.1 ट्रिलियन डॉलर है और यह दुनिया की 7000 से ज्यादा कंपनियों में निवेश करता है।

  • Que: पीएम मोदी की नॉर्वे यात्रा से भारत को क्या फायदा हुआ?

    Ans: भारत और नॉर्वे के बीच क्लीन एनर्जी, तेल-गैस सप्लाई और AI तकनीक को लेकर समझौते हुए। इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और ग्रीन एनर्जी सेक्टर को मजबूती मिलेगी।

How norway sovereign wealth fund became rich and pm modi india deal

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Published On: May 22, 2026 | 09:30 AM

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