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महाविनाश या महाविकास: 92000 करोड़ का निकोबार प्रोजेक्ट विवादों में, जयराम रमेश ने रक्षा मंत्री को लिखा पत्र
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
Great Nicobar Project: ग्रेट निकोबार में 92 हजार करोड़ की मेगा परियोजना पर जयराम रमेश ने रक्षा मंत्री को पत्र लिखकर पर्यावरण और आदिवासियों के अधिकारों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। जानिए मामला क्या है-

जयराम रमेश (फाइल फोटो), फोटो- सोशल मीडिया
Great Nicobar Project Controversy: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सुदूर दक्षिण में स्थित ग्रेट निकोबार द्वीप इन दिनों एक बड़े वैचारिक और राजनीतिक संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। एक तरफ केंद्र सरकार की लगभग 92,000 करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी ‘ग्रेट निकोबार परियोजना’ है, जिसे देश की प्रगति और सामरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा कदम बताया जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ पर्यावरणविद् और विपक्षी नेता इसकी भारी पर्यावरणीय कीमत को लेकर सरकार को घेर रहे हैं।
यह मुद्दा अब केवल सरकारी फाइलों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर हमारी प्राकृतिक विरासत और उन आदिवासी समुदायों पर पड़ने वाला है, जो सदियों से इस द्वीप के मूल निवासी रहे हैं।
निकोबार की इस मेगा परियोजना का पूरा सच
भारत सरकार द्वारा शुरू की गई इस मेगा-इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना की रूपरेखा बहुत विशाल है। इसमें एक बड़ा इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT), एक ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, एक आधुनिक शहर और 450 मेगावाट का गैस व सौर ऊर्जा संयंत्र बनाना शामिल है। रणनीतिक दृष्टि से देखें तो यह द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के बेहद करीब स्थित है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रास्तों में से एक माना जाता है।
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इस क्षेत्र में भारत की मजबूत मौजूदगी होने से न केवल वैश्विक व्यापार मार्गों पर नजर रखी जा सकेगी, बल्कि हिंद महासागर में चीन की बढ़ती गतिविधियों को भी नियंत्रित किया जा सकेगा। लेकिन इस सामरिक बढ़त के साथ जुड़ा हुआ पर्यावरणीय संकट अब एक बड़े राष्ट्रीय विवाद का रूप ले चुका है।
आदिवासियों और पर्यावरण पर संकट की आहट ने बढ़ाई चिंता
कांग्रेस के नेता और राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने इस मामले पर मोर्चा खोलते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को एक पत्र लिखा है। इस पत्र के माध्यम से उन्होंने प्रोजेक्ट की वजह से होने वाले ‘इकोलॉजिकल’ यानी पारिस्थितिक नुकसान की ओर गंभीर इशारा किया है। रमेश का आरोप है कि सरकार द्वारा इस परियोजना को लेकर जो अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न जारी किए गए थे, वे पर्यावरण और वन अधिकारों की मंजूरी को लेकर एक भ्रामक तस्वीर पेश करते हैं।
उनके अनुसार, यह पूरी प्रक्रिया वन अधिकार अधिनियम, 2006 के प्रावधानों का खुला उल्लंघन है। उन्होंने चिंता जताई है कि यह कदम उन आदिवासी समुदायों को संसद द्वारा दिए गए व्यक्तिगत और सामूहिक अधिकारों की मूल भावना को ठेस पहुंचाता है।
रक्षा मंत्री को लिखे पत्र में जयराम रमेश ने किए ये सवाल
जयराम रमेश ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि वे देश की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के खिलाफ नहीं हैं और रणनीतिक सुरक्षा पर कोई मतभेद नहीं हो सकता। लेकिन उनकी आपत्ति इस बात पर है कि मूल रूप से एक व्यावसायिक उद्यम होने के बावजूद इस प्रोजेक्ट को ‘सर्वोपरि सुरक्षा कारणों’ के आधार पर उचित ठहराया जा रहा है।
उन्होंने एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखते हुए कहा कि ग्रेट निकोबार के कैंपबेल वे में स्थित नौसैनिक बेस आईएनएस बाज को 2012 में ही कमीशन किया गया था। लेकिन वहां के रनवे की लंबाई बढ़ाने और एक नौसैनिक जेट्टी बनाने की योजनाएं पिछले पांच वर्षों से मंजूरी का इंतजार कर रही हैं, जबकि उनके पर्यावरणीय दुष्प्रभाव भी बहुत कम हैं।
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सुरक्षा की आड़ में पर्यावरण और आदिवासियों की अनदेखी: रमेश
इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब छोटे स्तर की जरूरी सैन्य योजनाएं लंबित हैं, तो इतने बड़े प्रोजेक्ट के लिए इतनी हड़बड़ी क्यों दिखाई जा रही है? जयराम रमेश ने पहले भी पर्यावरण और जनजातीय कार्य मंत्रियों को पत्र लिखकर इस योजना की संदिग्ध मंजूरियों पर सवाल उठाए थे। उनका मानना है कि सरकार को सुरक्षा की आड़ में पर्यावरण और आदिवासियों के अधिकारों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। एक पारदर्शी लोकतंत्र में विकास का मतलब केवल इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना नहीं होता, बल्कि उसमें समाज के सबसे कमजोर तबके और प्रकृति का संरक्षण भी शामिल होना चाहिए।
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