

CBSE OSM Controversy: भारतीय शिक्षा व्यवस्था इस समय अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। पिछले महीने पहले NEET UG की परीक्षा का पेपर लीक हो गया और फिर जब 13 मई को CBSE 12वीं के रिजल्ट सामने आए तो इसे लेकर भी विवाद खड़े हो गए। छात्रों ने ऑन स्क्रीन मार्किंग यानी OSM सिस्टम पर सवाल उठाए।
छात्रों और अभिभावकों का कहना है कि मूल्यांकन में कई तरह की गड़बड़ियां हुई हैं। इससे न सिर्फ CBSE की साख पर असर पड़ा है, बल्कि शिक्षा मंत्रालय को भी आलोचना का सामना करना पड़ा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने बोर्ड के शीर्ष अधिकारियों में बड़ा बदलाव कर दिया है। लेकिन इसके बाद भी कई सवाल ऐसे हैं जिनके जवाब मिलने बाकी हैं। सबसे बड़े शिक्षा बोर्ड होने के बाद भी CBSE की परिक्षाओं और मूल्यांकन को लेकर बार-बार क्यों खड़े हो रहे हैं? OSM सिस्टम क्या है और इसमें क्या कमियां हैं? CBSE से कहां चूक हो रही है?
उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (UP Board) के बाद केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) दुनिया का सबसे बड़ा शिक्षा बोर्ड है। जिसमें करीब 40 करोड़ से अधिक छात्र इससे जुड़े हैं। इस साल जब 13 मई को CBSE 12वीं के रिजल्ट आए तो परीणामों को लेकर छात्रों में साफ असंतोष दिखाई दिया। छात्रों ने आरोप लगाया कि उनके उत्तर पुस्तिका की जांच सही से नहीं की गई जिसके चलते उनके नंबर कम आए हैं।
छात्रों ने इसके लिए OSM सिस्टम को जिम्मेदार ठहराया। अब क्योंकि OSM सिस्टम को जिम्मेदार ठहराने वाले छात्रों की संख्या लाखों में थी। बोर्ड ने शुरुआत में छोटी-मोटी गलती बताया लेकिन जब छात्रों द्वारा इसके लेकर तथ्य किए। तब बोर्ड ने भी स्वीकार किया कि मूल्यांकन में कुछ गलतियां हुई और इसे जल्द ही ठीक कर लिया जाएगा। इसके अलावा बोर्ड ने OSM सिस्टम को भी सही करने की बात कही, जिसे लेकर यह पूरा विवाद शुरू हुआ था।
ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम यानी OMS सिस्टम को CBSE ने लागू किया था। इसमें कुल चार स्टेप में छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन किया गया था।
छात्रों का आरोप था कि, कई कॉपियों को ठीक से स्कैन नहीं किया गया था, जिसके चलते स्कैन होने के बाद उन्हें पढ़ना काफी मुश्किल हो गया था। परीक्षकों ने छात्रों के लिखे जवाब को ठीक से पढ़ा ही नहीं और कम नंबर दे दिए। इसके अलावा कई छात्रों ने यह भी आरोप लगाया कि उनके नाम पर किसी और छाक्ष की कॉपी चेक की गई और नंबर दे दिए गए। छात्रों के आरोप सही भी साबित हुए। इसके बाद बोर्ड ने छात्रों को री-इवैल्युएशन का विकल्प मुहैया कराने का आश्वासन दिया।
बोर्ड ने री-इवैल्युएशन के लिए 1 मई को पोर्टल शुरू करना की बात कही। लेकिन जैसे ही पोर्टल खुला इसने एक नया विवाद खड़ा कर दिया। क्योंकि पोर्टल 1 जून को शुरू ही नहीं हो पाया और पूरे दिन अंडर मेंटेनेंस दिखाता रहा। 2 जून को कुछ समय के लिए पोर्टल खुला, लेकिन फिर बंद हो गया। लाखों छात्रों ने शिकायत की कि वे अपनी कॉपियों की दोबारा जांच के लिए आवेदन ही नहीं कर पा रहे हैं। करीब 17 लाख छात्रों को इस स्थिति से परेशानी और तनाव का सामना करना पड़ा।
इस विवाद के केंद्र में एक सॉफ्टवेयर कंपनी COEMPT एडुटेक रही है, जिसे लगभग 384 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट दिया गया था। हैदराबाद की इस कंपनी ने टेंडर प्रक्रिया में TCS जैसी बड़ी कंपनी को पीछे छोड़ दिया। जानकारी के मुताबिक, तकनीकी मूल्यांकन में कोएम्प्ट को 91 अंक मिले जबकि TCS को 89 अंक मिले। सबसे हैरानी की बात यह रही कि सब्जेक्टिव आंसर बुक मूल्यांकन के एक महत्वपूर्ण मानदंड में कोएम्प्ट को 100 अंक मिले, जबकि TCS को शून्य अंक दिए गए। वित्तीय बोली में भी बड़ा अंतर था। कोएम्प्ट ने प्रति कॉपी जांचने की कीमत 25 रुपये रखी थी जबकि TCS की कीमत 53 से 65 रुपये के बीच थी। इसी वजह से कुल लागत में लगभग 566 करोड़ रुपये का अंतर आया और कोएम्प्ट को बढ़त मिल गई।
रिपोर्ट के मुताबिक, टेंडर प्रक्रिया के दौरान कई महत्वपूर्ण नियमों में ढील दी गई थी। पहले उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैनिंग 300 DPI पर होनी थी, लेकिन बाद में इसे घटाकर 200 DPI कर दिया गया। हाई-स्पीड रोबोटिक स्कैनर की शर्त भी हटा दी गई और सामान्य स्कैनर की अनुमति दे दी गई। सबसे बड़ा सवाल यह है कि टेंडर से ब्लैकलिस्टिंग क्लॉज भी हटा दिया गया था। इसका मतलब यह था कि पहले से ब्लैकलिस्ट में डाली गई कंपनियां भी आवेदन कर सकती थीं। इसके अलावा सॉफ्टवेयर गुणवत्ता का मानक CMMI लेवल 5 से घटाकर लेवल 3 कर दिया गया। आलोचकों का कहना है कि इस प्रक्रिया में गुणवत्ता की जगह संख्या और कम लागत को ज्यादा महत्व दिया गया।
इन सब विवादों के बीच CBSE ने दावा किया कि पोर्टल पर साइबर हमले की कोशिश भी हुई थी। बोर्ड के अनुसार केवल दो मिनट में लगभग 15 लाख हिट्स आए और एक लाख से ज्यादा बार अनधिकृत प्रवेश की कोशिश की गई। बोर्ड का कहना है कि तकनीकी टीम लगातार स्थिति पर नजर रख रही है और जरूरी सुधार किए जा रहे हैं।
इसके बाद ये मामला संसद की समिति तक पहुंचा तो शिक्षा मंत्रालय ने CBSE से जवाब मांगा। मंत्रालय को बोर्ड का स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं लगा। इसके बाद सरकार ने CBSE के चेयरमैन राहुल सिंह और सचिव हिमांशु गुप्ता का तबादला कर दिया। उनकी जगह लोखंडे प्रशांत सीताराम को नया चेयरमैन और वरुण भारद्वाज को नया सचिव बनाया गया है।
यह पूरा मामला दिखाता है कि नई तकनीक को लागू करने से पहले उसकी पूरी तैयारी और परीक्षण कितना जरूरी होता है। OSM सिस्टम रिजल्ट को तेज तो बनाता है लेकिन इसमें कई कमियां है जिसे दूर किया जाना जरुरी है। इसके अलावा टेंडर प्रक्रिया के दौरान दी गई ढील पर सवाल किया जाना कहीं से भी गलत नहीं लगता है। क्योंकि CBSE के इस कदम से लाखों बच्चे परेशानियों का सामना कर रहे हैं।