

महाराजा हरि सिंह 1947 में जम्मू-कश्मीर को स्वतंत्र रखना चाहते थे
22 अक्टूबर 1947 को कबायली लड़ाकों ने जम्मू-कश्मीर पर हमला किया
26 अक्टूबर को महाराजा ने भारत के साथ विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए
Jammu and kashmir Association Day: तारीख 22 अक्टूबर 1947, कश्मीर की वादियों में सर्दी दस्तक दे रही थी, लेकिन जम्मू-कश्मीर की सियासत में तूफान उठ चुका था। भारत को आजाद और पाकिस्तान को बने करीब दो महीने हो रहे थे। लेकिन अभी तक जम्मू-कश्मीर के महाराज ने यह ऐलान नहीं किया था कि वो किस देश का हिस्सा बनना चाहते हैं भारत या पाकिस्तान? इसी बीच पाकिस्तान के कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना ने एक बड़ी चाल चलते हुए चुपके से पाकिस्तानी सैनिकों के साथ कबायली लड़ाके को श्रीनगर पर कब्जा करने के लिए भेज दिया था।
महाराजा हरि सिंह के सामने अब सबसे बड़ा सवाल था क्या वो अकेले अपनी रियासत पर पाकिस्तान का कब्जा होने से रोक पाएंगे? कुछ ही दिनों में हालात ऐसे बदले कि जिस महाराजा को भारत के साथ विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने पड़े। लेकिन सवाल यह है कि आखिर महाराजा हरि सिंह ने अपना रुख क्यों बदला और विलय के सात दशक से ज्यादा समय बाद भी कश्मीर विवाद क्यों बना हुआ है?
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ और ब्रिटिश शासन समाप्त होने के साथ देशी रियासतों के सामने अपने भविष्य का फैसला करने की चुनौती आई। उस समय जम्मू-कश्मीर पर महाराजा हरि सिंह का शासन था। उनकी रियासत में कश्मीर घाटी, जम्मू, लद्दाख और अन्य क्षेत्र शामिल थे, जिनकी सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परिस्थितियां अलग-अलग थीं।
महाराजा तत्काल भारत या पाकिस्तान में शामिल होने के बजाय स्वतंत्र रहने की संभावना तलाश रहे थे। वह अपनी रियासत की स्वायत्तता और शासन पर नियंत्रण बनाए रखना चाहते थे। हालांकि भारत और पाकिस्तान के बीच जम्मू-कश्मीर की भौगोलिक स्थिति भी इसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती थी। ऐसे में महाराजा के लिए लंबे समय तक किसी स्पष्ट राजनीतिक व्यवस्था के बिना रहना आसान नहीं था।
22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान की ओर से आए कबायली लड़ाकों ने जम्मू-कश्मीर पर हमला कर दिया। वे मुजफ्फराबाद और बारामूला की दिशा से आगे बढ़ते हुए श्रीनगर की ओर बढ़ने लगे। इस हमले ने रियासत की सुरक्षा व्यवस्था को गंभीर संकट में डाल दिया।
महाराजा हरि सिंह ने भारत सरकार से सैन्य सहायता मांगी। भारत के सामने भी सवाल था कि जम्मू-कश्मीर में सेना भेजने का कानूनी आधार क्या होगा। इसी बीच भारत में विलय का मुद्दा निर्णायक हो गया। महाराजा के सामने अब स्वतंत्र रहने की संभावना से ज्यादा तत्काल चुनौती अपनी रियासत को हमले से बचाने की थी।
महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत के साथ विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए। अगले दिन, 27 अक्टूबर को, भारत के तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने इसे स्वीकार कर लिया। इसी दिन भारतीय सेना श्रीनगर पहुंची। सेना का उद्देश्य हमलावरों को रोकना और राज्य के महत्वपूर्ण क्षेत्रों की रक्षा करना था। विलय-पत्र के तहत भारत की केंद्रीय सरकार को रक्षा, विदेश मामले और संचार जैसे निर्धारित विषयों पर अधिकार मिले।
जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय होने के बावजूद भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष जारी रहा। 1947-48 के युद्ध के बाद क्षेत्र अलग-अलग हिस्सों में बंट गया और दोनों देशों के बीच विवाद स्थायी राजनीतिक मुद्दा बन गया।
जनवरी 1948 में भारत ने कश्मीर का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उठाया। सुरक्षा परिषद ने युद्धविराम और जनमत-संग्रह के लिए परिस्थितियां बनाने से संबंधित प्रस्ताव पारित किए। हालांकि, प्रस्ताव में निर्धारित शर्तों और उन्हें लागू करने के तरीके पर भारत और पाकिस्तान के बीच सहमति नहीं बन सकी। नतीजतन, जनमत-संग्रह नहीं हुआ।
भारत का पक्ष रहा है कि महाराजा द्वारा हस्ताक्षरित विलय-पत्र और भारत सरकार की स्वीकृति ने जम्मू-कश्मीर के भारत में शामिल होने का कानूनी आधार बनाया। पाकिस्तान ने इस विलय को चुनौती दी और कश्मीर के भविष्य को लेकर अलग रुख अपनाया।
महाराजा हरि सिंह के फैसले को समझने के लिए उस समय की परिस्थितियों को देखना जरूरी है। स्वतंत्र रहने की उनकी शुरुआती इच्छा, अक्टूबर 1947 का हमला, भारत से सैन्य सहायता की मांग और विलय-पत्र पर हस्ताक्षर इन सभी घटनाओं ने मिलकर जम्मू-कश्मीर का इतिहास तय किया। आज भी भारत और पाकिस्तान के बीच क्षेत्रीय दावों को लेकर मतभेद हैं, जबकि जम्मू-कश्मीर के भविष्य और वहां के लोगों की राजनीतिक आकांक्षाओं पर बहस जारी है।